सरसंघचालक

सरसंघचालक

🚩 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

सरसंघचालक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर्वोच्च मार्गदर्शक एवं वैचारिक नेतृत्वकर्ता

सरसंघचालक कौन होते हैं?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में सरसंघचालक संगठन के सर्वोच्च मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत होते हैं। वे संघ की विचारधारा, कार्यपद्धति तथा दीर्घकालीन दिशा का मार्गदर्शन करते हैं। संगठन के सभी स्वयंसेवकों के लिए उनका जीवन सेवा, समर्पण, अनुशासन एवं राष्ट्रभक्ति का प्रेरणादायक उदाहरण माना जाता है।

वर्ष 1925 में संघ की स्थापना परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। तब से लेकर वर्तमान तक सभी सरसंघचालकों ने संगठन के विस्तार, राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता, सेवा कार्य तथा सांस्कृतिक जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस पृष्ठ पर आपको संघ के सभी सरसंघचालकों का जीवन परिचय, कार्यकाल, प्रमुख उपलब्धियाँ, प्रेरणादायक विचार एवं ऐतिहासिक योगदान एक ही स्थान पर सरल एवं व्यवस्थित रूप में प्राप्त होगा।

1925

संघ स्थापना

6

सरसंघचालक

100+

वर्षों की यात्रा

वर्तमान

डॉ. मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी सरसंघचालक

वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के बाद से अब तक विभिन्न सरसंघचालकों ने अपने नेतृत्व, संगठन क्षमता एवं राष्ट्र समर्पण के माध्यम से संघ को नई दिशा प्रदान की है। नीचे सभी सरसंघचालकों की कार्यकाल अनुसार सूची दी गई है।

01

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

1925 – 1940

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक।

02

माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी)

1940 – 1973

संघ के वैचारिक विस्तार एवं संगठन सुदृढ़ीकरण का महत्वपूर्ण कार्य।

03

बालासाहब देवरस

1973 – 1994

सामाजिक समरसता एवं सेवा कार्यों को नई गति प्रदान की।

04

प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)

1994 – 2000

सरल व्यक्तित्व एवं वैज्ञानिक सोच के लिए प्रसिद्ध।

05

के. एस. सुदर्शन

2000 – 2009

स्वदेशी विचार, संगठन विस्तार एवं बौद्धिक नेतृत्व।

06

डॉ. मोहन भागवत

2009 – वर्तमान

वर्तमान सरसंघचालक एवं संगठन के सर्वोच्च मार्गदर्शक।

🚩 संघ का इतिहास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी सरसंघचालकों की समयरेखा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई। तब से लेकर वर्तमान तक विभिन्न सरसंघचालकों ने अपने नेतृत्व, संगठन क्षमता, राष्ट्रभक्ति एवं समाज सेवा के माध्यम से संघ को नई दिशा प्रदान की। नीचे सभी सरसंघचालकों का कार्यकाल क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत है।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

1925 – 1940

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक। उन्होंने विजयादशमी 1925 को संघ की स्थापना की और राष्ट्र जीवन में संगठन की नई दिशा प्रदान की।

माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी)

1940 – 1973

संघ के द्वितीय सरसंघचालक। उन्होंने संघ के वैचारिक विस्तार, संगठन निर्माण एवं अखिल भारतीय स्वरूप को मजबूत किया।

बालासाहब देवरस

1973 – 1994

सामाजिक समरसता, सेवा कार्य एवं समाज के विभिन्न वर्गों तक संघ के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)

1994 – 2000

सरल व्यक्तित्व, वैज्ञानिक सोच एवं संगठनात्मक क्षमता के कारण संघ के इतिहास में उनका विशेष स्थान है।

के. एस. सुदर्शन

2000 – 2009

स्वदेशी चिंतन, बौद्धिक नेतृत्व एवं संगठनात्मक नवाचारों के माध्यम से संघ को नई ऊर्जा प्रदान की।

डॉ. मोहन भागवत

2009 – वर्तमान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक। उनके नेतृत्व में सेवा, सामाजिक समरसता एवं संगठन विस्तार के अनेक कार्य निरंतर चल रहे हैं।

🚩 प्रथम सरसंघचालक

परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने वर्ष 1925 में संघ की स्थापना कर संगठित एवं सशक्त राष्ट्र निर्माण का आधार रखा। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा, संगठन और चरित्र निर्माण को समर्पित रहा।

डॉ. केशव
बलिराम हेडगेवार

प्रथम सरसंघचालक

1925 – 1940

संक्षिप्त जीवन परिचय

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर में हुआ। बचपन से ही उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल थी। उन्होंने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया तथा स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए एक सशक्त, अनुशासित एवं संगठित समाज की आवश्यकता को अनुभव किया।

विजयादशमी के पावन अवसर पर वर्ष 1925 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उनका उद्देश्य समाज को जाति, भाषा, प्रांत और अन्य भेदों से ऊपर उठाकर राष्ट्रहित के लिए संगठित करना था। उनके नेतृत्व में संघ ने चरित्र निर्माण, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति को अपना मूल आधार बनाया।

1889

जन्म

1925

संघ की स्थापना

15 वर्ष

प्रथम सरसंघचालक

1940

महाप्रयाण

"संगठित समाज ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होता है।"
🚩 जीवन यात्रा

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की जीवन यात्रा

राष्ट्रभक्ति, संगठन, अनुशासन और समाज सेवा के आदर्शों से प्रेरित डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का सम्पूर्ण जीवन भारत माता की सेवा के लिए समर्पित रहा। नीचे उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है।

1889

जन्म

1 अप्रैल 1889 को नागपुर में जन्म हुआ। बचपन से ही उनमें राष्ट्रभक्ति, आत्मसम्मान और नेतृत्व क्षमता के गुण दिखाई देने लगे थे।

विद्यालय जीवन

देशभक्ति की शुरुआत

विद्यार्थी जीवन में ही विदेशी शासन का विरोध किया तथा 'वंदे मातरम्' आंदोलन सहित अनेक राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय रहे।

कोलकाता

चिकित्सा शिक्षा

राष्ट्रीय मेडिकल कॉलेज, कोलकाता से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। इसी दौरान अनेक क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादी विचारों से उनका गहरा संपर्क हुआ।

1925

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना

विजयादशमी के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर संगठित, चरित्रवान एवं राष्ट्रनिष्ठ समाज निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया।

1940

महाप्रयाण

21 जून 1940 को उनका महाप्रयाण हुआ। उनके द्वारा स्थापित संगठन आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक माना जाता है।

1889

जन्म वर्ष

1925

संघ स्थापना

15 वर्ष

प्रथम सरसंघचालक का कार्यकाल

1940

महाप्रयाण

🚩 प्रथम सरसंघचालक

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जीवन परिचय

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक थे। उनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रभक्ति, संगठन निर्माण, चरित्र निर्माण और समाज सेवा के आदर्शों को समर्पित रहा। उन्होंने संगठित हिन्दू समाज के माध्यम से सशक्त भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

संघ संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक

  • 📅 जन्म : 1 अप्रैल 1889
  • 📍 जन्म स्थान : नागपुर
  • 🎓 शिक्षा : चिकित्सा (Medical)
  • 🚩 संघ स्थापना : 1925
  • 👤 प्रथम सरसंघचालक
  • 🕊 महाप्रयाण : 21 जून 1940

बाल्यकाल एवं प्रारम्भिक जीवन

बाल्यकाल से ही डॉ. हेडगेवार के मन में राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल थी। अंग्रेज़ी शासन के प्रति उनका विरोध बचपन से ही स्पष्ट दिखाई देता था। विद्यालय में भी वे देशभक्ति से प्रेरित गतिविधियों में सक्रिय रहते थे तथा अन्य विद्यार्थियों को भी राष्ट्रप्रेम के लिए प्रेरित करते थे।

शिक्षा एवं राष्ट्रवादी विचार

उन्होंने कोलकाता के राष्ट्रीय मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। अध्ययन काल में उनका सम्पर्क अनेक क्रांतिकारियों एवं राष्ट्रवादी विचारकों से हुआ, जिससे उनके व्यक्तित्व में संगठन, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के संस्कार और अधिक मजबूत हुए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना

विजयादशमी, वर्ष 1925 को उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उनका उद्देश्य ऐसा संगठित समाज तैयार करना था जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए सेवा, संस्कार और चरित्र निर्माण के माध्यम से भारत को सशक्त बनाए।

व्यक्तित्व एवं विरासत

डॉ. हेडगेवार का सम्पूर्ण जीवन अनुशासन, सादगी, संगठन क्षमता और राष्ट्र समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। उनके द्वारा स्थापित संगठन आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक माना जाता है और लाखों स्वयंसेवकों को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करता है।

"व्यक्ति नहीं, संगठित समाज ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होता है।"
🚩 राष्ट्र निर्माण

डॉ. हेडगेवार के प्रमुख योगदान एवं उपलब्धियाँ

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित रहा। उन्होंने केवल एक संगठन की स्थापना ही नहीं की, बल्कि एक ऐसी विचारधारा का निर्माण किया जिसने लाखों स्वयंसेवकों को राष्ट्र सेवा, अनुशासन एवं चरित्र निर्माण के मार्ग पर प्रेरित किया।

🏛

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना

विजयादशमी 1925 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर उन्होंने संगठित एवं चरित्रवान समाज निर्माण की दिशा में ऐतिहासिक कार्य किया। उनका उद्देश्य राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाले स्वयंसेवकों का निर्माण करना था।

🤝

संगठन निर्माण

उन्होंने समाज को जाति, भाषा, क्षेत्र एवं अन्य भेदों से ऊपर उठाकर एक संगठित राष्ट्र की भावना विकसित करने का कार्य किया। शाखा पद्धति के माध्यम से अनुशासन एवं नेतृत्व क्षमता का विकास किया।

🎓

चरित्र निर्माण

डॉ. हेडगेवार का विश्वास था कि राष्ट्र का भविष्य चरित्रवान नागरिकों पर निर्भर करता है। उन्होंने युवाओं में अनुशासन, सेवा, नेतृत्व एवं राष्ट्रभक्ति के संस्कार विकसित करने पर विशेष बल दिया।

🇮🇳

स्वतंत्रता चेतना

वे स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय भावना से प्रेरित थे। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए संगठित, जागरूक एवं राष्ट्रनिष्ठ समाज की आवश्यकता है।

🌏

राष्ट्र प्रथम का संदेश

उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि व्यक्तिगत हितों से ऊपर राष्ट्रहित होना चाहिए। उनके विचार आज भी लाखों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

🚩

अमर विरासत

उनके द्वारा स्थापित संगठन आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में गिना जाता है। उनका जीवन, त्याग और संगठन निर्माण की प्रेरणा आज भी समाज के लिए पथप्रदर्शक है।

डॉ. हेडगेवार का संदेश

"राष्ट्र की शक्ति किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि संगठित, संस्कारित एवं चरित्रवान समाज में निहित होती है। जब समाज संगठित होता है, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है और विश्व में अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करता है।"

🚩 आदर्श एवं विचार

डॉ. हेडगेवार के मूल सिद्धांत

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का विश्वास था कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके संगठित, संस्कारित एवं चरित्रवान समाज में निहित होती है। उनके जीवन के सिद्धांत आज भी लाखों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

🇮🇳

राष्ट्र सर्वोपरि

डॉ. हेडगेवार के लिए राष्ट्रहित सबसे ऊपर था। उनका मानना था कि व्यक्ति, समाज और संगठन का प्रत्येक कार्य राष्ट्र की उन्नति एवं अखंडता के लिए होना चाहिए।

🤝

संगठन की शक्ति

उन्होंने समाज को संगठित करने पर विशेष बल दिया। उनका विश्वास था कि संगठित समाज किसी भी चुनौती का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है।

🎯

चरित्र निर्माण

उन्होंने ऐसे नागरिकों का निर्माण करने पर बल दिया जो अनुशासित, निस्वार्थ, ईमानदार तथा राष्ट्रभक्त हों और समाज के लिए प्रेरणा बन सकें।

❤️

सेवा भाव

समाज की निःस्वार्थ सेवा को उन्होंने राष्ट्र निर्माण का आधार माना। सेवा, सहयोग और समर्पण उनके जीवन के प्रमुख आदर्श थे।

📚

संस्कार एवं शिक्षा

उन्होंने युवाओं में नैतिक मूल्यों, अनुशासन और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान विकसित करने पर विशेष बल दिया।

🚩

एकात्मता

जाति, भाषा, प्रांत एवं अन्य सभी भेदों से ऊपर उठकर सम्पूर्ण समाज को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा उनके विचारों का मूल आधार थी।

प्रेरणादायक संदेश

"व्यक्ति का गौरव उसके पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण से होता है।"

🚩 द्वितीय सरसंघचालक

परम पूजनीय श्री गुरुजी
(माधव सदाशिव गोलवलकर)

परम पूजनीय श्री गुरुजी, जिनका पूरा नाम माधव सदाशिव गोलवलकर था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक थे। उन्होंने वर्ष 1940 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के पश्चात संगठन का नेतृत्व संभाला और लगभग 33 वर्षों तक अपने दूरदर्शी नेतृत्व, आध्यात्मिक चिंतन एवं संगठन कौशल से संघ को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया।

श्री गुरुजी

द्वितीय सरसंघचालक

  • 📅 जन्म : 19 फ़रवरी 1906
  • 📍 जन्म स्थान : रामटेक (महाराष्ट्र)
  • 🎓 शिक्षा : विज्ञान (M.Sc.), विधि अध्ययन
  • 🚩 सरसंघचालक : 1940 – 1973
  • 🌍 कार्यकाल : लगभग 33 वर्ष
  • 🕊 महाप्रयाण : 5 जून 1973

प्रारम्भिक जीवन

19 फ़रवरी 1906 को जन्मे माधव सदाशिव गोलवलकर बचपन से ही अत्यंत मेधावी, अनुशासित तथा अध्ययनशील थे। उनके माता-पिता ने उनमें भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रप्रेम के संस्कार विकसित किए। प्रारम्भिक शिक्षा के दौरान ही उनकी असाधारण स्मरण शक्ति, तर्कशक्ति और ज्ञान के प्रति गहरी रुचि स्पष्ट दिखाई देने लगी।

विद्यालय एवं महाविद्यालय जीवन में उन्होंने विज्ञान विषय का गहन अध्ययन किया। अध्ययन के साथ-साथ भारतीय दर्शन, अध्यात्म, इतिहास तथा संस्कृति का भी गंभीर अध्ययन किया, जिसने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को व्यापक वैचारिक आधार प्रदान किया।

शिक्षा एवं व्यक्तित्व

उन्होंने विज्ञान विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया। अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व, सरल स्वभाव तथा ज्ञान के कारण विद्यार्थियों के बीच वे अत्यंत लोकप्रिय थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान विद्यार्थियों ने उन्हें सम्मानपूर्वक "गुरुजी" कहना प्रारम्भ किया और यही संबोधन आगे चलकर पूरे राष्ट्र में प्रसिद्ध हो गया।

उनका व्यक्तित्व केवल एक शिक्षक का नहीं था, बल्कि वे एक विचारक, आध्यात्मिक साधक, कुशल संगठनकर्ता और प्रेरक वक्ता भी थे। भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी गहरी आस्था और राष्ट्र के प्रति समर्पण ने उन्हें समाज जीवन में विशिष्ट स्थान दिलाया।

1906

जन्म वर्ष

M.Sc.

उच्च शिक्षा

1940

द्वितीय सरसंघचालक

33 वर्ष

नेतृत्व काल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान उनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों से हुआ। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के व्यक्तित्व, संगठन निर्माण की कार्यशैली तथा राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण ने श्री गुरुजी को अत्यंत प्रभावित किया। धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को संघ कार्य के लिए समर्पित कर दिया।

डॉ. हेडगेवार ने उनके व्यक्तित्व, नेतृत्व क्षमता एवं वैचारिक स्पष्टता को पहचानते हुए उन्हें संघ के विभिन्न उत्तरदायित्व सौंपे। वे शीघ्र ही संगठन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में सम्मिलित हो गए और पूरे देश में प्रवास कर स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन करने लगे।

द्वितीय सरसंघचालक के रूप में दायित्व

वर्ष 1940 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के महाप्रयाण के पश्चात श्री गुरुजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का द्वितीय सरसंघचालक नियुक्त किया गया। उस समय संघ का कार्य सीमित क्षेत्रों तक था, किन्तु उनके नेतृत्व में संघ का विस्तार देश के लगभग प्रत्येक प्रांत तक हुआ।

उन्होंने शाखा व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ बनाया, प्रशिक्षण वर्गों का विस्तार किया तथा राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा, शिक्षा, सामाजिक संगठन एवं सांस्कृतिक जागरण के अनेक कार्यों को गति प्रदान की।

नेतृत्व शैली एवं कार्यपद्धति

श्री गुरुजी का नेतृत्व अत्यंत सरल, आत्मीय एवं प्रेरणादायी था। वे प्रत्येक स्वयंसेवक के साथ व्यक्तिगत संवाद स्थापित करने में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि संगठन की शक्ति व्यक्ति निर्माण से आती है और व्यक्ति निर्माण संस्कार, अनुशासन एवं नियमित अभ्यास से होता है।

उन्होंने हजारों प्रवास किए, लाखों स्वयंसेवकों से प्रत्यक्ष संवाद किया तथा संगठन के विस्तार के लिए अथक परिश्रम किया। उनके नेतृत्व में संघ ने सेवा, शिक्षा, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता तथा राष्ट्र जागरण के अनेक क्षेत्रों में अपनी सक्रिय भूमिका विकसित की।

प्रमुख उपलब्धियाँ

33 वर्ष

दीर्घ नेतृत्व

अखिल भारतीय

संघ विस्तार

50,000+

स्वयं लिखे पत्र

70+

देशव्यापी प्रवास

संगठन

वैचारिक सुदृढ़ीकरण

सेवा

समाज जीवन में विस्तार

श्री गुरुजी की विरासत

श्री गुरुजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को केवल एक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र जीवन के व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में विकसित किया। उनके मार्गदर्शन में अनेक सामाजिक, शैक्षिक, सेवा एवं राष्ट्रहित के कार्यों का विस्तार हुआ।

उनके विचार आज भी संगठन के लाखों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। संगठन, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति, सेवा और सांस्कृतिक चेतना के जिन मूल्यों को उन्होंने स्थापित किया, वे आज भी संघ कार्य की आधारशिला माने जाते हैं।

"संगठन की वास्तविक शक्ति उसके स्वयंसेवकों के चरित्र, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठ जीवन में निहित होती है।"

— परम पूजनीय श्री गुरुजी
🚩 जीवन यात्रा

श्री गुरुजी का जीवन : वर्षवार समयरेखा

परम पूजनीय श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) का जीवन ज्ञान, अध्यात्म, संगठन एवं राष्ट्रसेवा का अद्भुत संगम था। नीचे उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत किया गया है।

1906

जन्म

19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में जन्म हुआ। बचपन से ही असाधारण स्मरण शक्ति, अध्ययनशीलता तथा भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था दिखाई देती थी।

1920–1930

उच्च शिक्षा एवं अध्यापन

विज्ञान विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। विद्यार्थियों के बीच वे "गुरुजी" नाम से लोकप्रिय हुए।

1930 के दशक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

डॉ. हेडगेवार के संपर्क में आने के बाद उन्होंने स्वयं को पूर्ण रूप से संघ कार्य के लिए समर्पित कर दिया और संगठन के प्रमुख दायित्वों का निर्वहन प्रारम्भ किया।

1940

द्वितीय सरसंघचालक बने

डॉ. हेडगेवार के महाप्रयाण के पश्चात उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का द्वितीय सरसंघचालक नियुक्त किया गया और उन्होंने संगठन का नेतृत्व संभाला।

1940–1973

अखिल भारतीय विस्तार

लगभग 33 वर्षों के नेतृत्व में उन्होंने संघ को देशव्यापी संगठन के रूप में विकसित किया। प्रशिक्षण, शाखा विस्तार, सेवा कार्य एवं वैचारिक मार्गदर्शन को नई गति मिली।

1973

महाप्रयाण

5 जून 1973 को उनका महाप्रयाण हुआ। उनके विचार, संगठन निर्माण की शैली एवं राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा आज भी लाखों स्वयंसेवकों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है।

🚩 योगदान एवं विरासत

श्री गुरुजी के प्रमुख योगदान

परम पूजनीय श्री गुरुजी ने लगभग 33 वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व करते हुए संगठन को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। उनके नेतृत्व में सेवा, संगठन, शिक्षा, सामाजिक समरसता एवं सांस्कृतिक जागरण के अनेक कार्यों का विस्तार हुआ।

🚩

संगठन का राष्ट्रीय विस्तार

श्री गुरुजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार देश के लगभग सभी राज्यों तक हुआ। शाखाओं की संख्या, प्रशिक्षण वर्गों तथा स्वयंसेवकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

📚

वैचारिक मार्गदर्शन

उन्होंने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद और संगठन की मूल विचारधारा को स्पष्ट रूप से समाज के सामने रखा तथा अनेक प्रेरणादायी व्याख्यान एवं लेखों के माध्यम से स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया।

🤝

समाज जीवन में विस्तार

शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, वनवासी कल्याण, श्रमिक, विद्यार्थी तथा विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में कार्य करने वाले अनेक संगठनों को प्रेरणा एवं दिशा प्रदान की।

🌏

देशव्यापी प्रवास

उन्होंने निरंतर देशभर का प्रवास किया, हजारों स्वयंसेवकों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित किया तथा संगठनात्मक एकता एवं आत्मीयता को मजबूत बनाया।

🧭

चरित्र निर्माण

उनका विशेष बल ऐसे स्वयंसेवकों के निर्माण पर था जो अनुशासित, निस्वार्थ, राष्ट्रनिष्ठ तथा समाज सेवा के लिए सदैव तत्पर रहें।

🏛

स्थायी विरासत

श्री गुरुजी के विचार, संगठन शैली एवं राष्ट्र समर्पित जीवन आज भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति के महत्वपूर्ण आधार माने जाते हैं और नई पीढ़ी के स्वयंसेवकों को प्रेरित करते हैं।

प्रेरणादायक विचार

"राष्ट्र का वैभव तभी संभव है जब समाज संगठित, संस्कारित और अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो।"

🚩 तृतीय सरसंघचालक

परम पूजनीय बालासाहब देवरस

परम पूजनीय मधुकर दत्तात्रेय (बालासाहब) देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक थे। उन्होंने वर्ष 1973 में यह दायित्व ग्रहण किया और संगठन को सामाजिक समरसता, सेवा कार्यों तथा राष्ट्र निर्माण के नए आयाम प्रदान किए। उनके नेतृत्व में संघ का कार्य समाज के विविध क्षेत्रों तक और अधिक व्यापक रूप से पहुँचा।

बालासाहब देवरस

तृतीय सरसंघचालक

  • 📅 जन्म : 11 दिसम्बर 1915
  • 📍 जन्म स्थान : नागपुर, महाराष्ट्र
  • 🎓 शिक्षा : बी.ए., एल.एल.बी.
  • 🚩 सरसंघचालक : 1973 – 1994
  • 🌍 कार्यकाल : लगभग 21 वर्ष
  • 🕊 महाप्रयाण : 17 जून 1996

प्रारम्भिक जीवन

बालासाहब देवरस का जन्म 11 दिसम्बर 1915 को नागपुर के एक साधारण एवं संस्कारित परिवार में हुआ। बचपन से ही वे अनुशासित, सरल स्वभाव एवं तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी थे। खेलकूद, अध्ययन तथा सामाजिक गतिविधियों में उनकी विशेष रुचि थी। प्रारम्भिक अवस्था से ही उनमें नेतृत्व क्षमता तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी।

नागपुर उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रारम्भिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। इसी वातावरण में बालासाहब का व्यक्तित्व विकसित हुआ और वे बहुत कम आयु में ही संघ की शाखा से जुड़ गए। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के सान्निध्य ने उनके जीवन की दिशा निर्धारित की।

शिक्षा एवं व्यक्तित्व

उन्होंने नागपुर में अपनी शिक्षा पूर्ण की तथा आगे चलकर स्नातक एवं विधि (एल.एल.बी.) की पढ़ाई की। विद्यार्थी जीवन में वे अध्ययनशील, अनुशासित तथा उत्कृष्ट संगठन क्षमता वाले युवा के रूप में पहचाने जाते थे। उनकी कार्यशैली अत्यंत व्यवहारिक, सरल और परिणामोन्मुख थी।

बालासाहब का व्यक्तित्व अत्यंत सहज एवं आत्मीय था। वे समाज के प्रत्येक वर्ग से संवाद स्थापित करने में विश्वास रखते थे। संगठन निर्माण, सेवा कार्य तथा सामाजिक समरसता के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता ने उन्हें संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं में विशेष स्थान दिलाया।

1915

जन्म वर्ष

LL.B.

उच्च शिक्षा

1973

सरसंघचालक

21 वर्ष

नेतृत्व काल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

बालासाहब देवरस किशोरावस्था से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से जुड़े। संघ संस्थापक परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के सान्निध्य में उन्हें संगठन की कार्यपद्धति, अनुशासन, सेवा तथा राष्ट्र समर्पण के संस्कार प्राप्त हुए। प्रारम्भ से ही वे शाखा के नियमित स्वयंसेवक रहे और विभिन्न दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए संगठन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में सम्मिलित हो गए।

उन्होंने नगर कार्यवाह, प्रांत स्तर के विभिन्न दायित्वों तथा सरकार्यवाह के रूप में संगठन के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी संगठन क्षमता, सरल व्यवहार एवं निर्णय लेने की योग्यता के कारण वे स्वयंसेवकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहे।

तृतीय सरसंघचालक के रूप में दायित्व

वर्ष 1973 में परम पूजनीय श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) के महाप्रयाण के पश्चात बालासाहब देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बने। उन्होंने लगभग 21 वर्षों तक संगठन का नेतृत्व करते हुए संघ कार्य को समाज जीवन के अनेक नए क्षेत्रों तक पहुँचाया।

उनके नेतृत्व में सेवा कार्यों, शिक्षा, ग्राम विकास, वनवासी क्षेत्रों, सामाजिक समरसता तथा राष्ट्रीय जागरण से जुड़े अनेक आयामों को नई गति मिली। उन्होंने संगठन को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाने का निरंतर प्रयास किया।

सामाजिक समरसता का संदेश

बालासाहब देवरस सामाजिक समरसता के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी एकता में निहित है। उन्होंने अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव तथा सामाजिक विभाजन को समाप्त करने के लिए समाज के सभी वर्गों के बीच संवाद, सहयोग एवं आत्मीयता पर विशेष बल दिया।

उनके अनेक सार्वजनिक उद्बोधनों में सामाजिक समानता, सेवा और राष्ट्रीय एकात्मता का स्पष्ट संदेश दिखाई देता है। उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुँचाने को राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण आधार माना।

नेतृत्व शैली

बालासाहब देवरस का नेतृत्व अत्यंत व्यवहारिक, सरल एवं दूरदर्शी था। वे प्रत्येक स्वयंसेवक से आत्मीय संबंध स्थापित करने में विश्वास रखते थे। निर्णय लेते समय वे संवाद, सामूहिक विचार-विमर्श तथा संगठनात्मक अनुशासन को सर्वोच्च महत्व देते थे।

उन्होंने संघ के कार्य को केवल शाखाओं तक सीमित न रखते हुए समाज जीवन के विविध क्षेत्रों—शिक्षा, सेवा, चिकित्सा, ग्राम विकास, युवाओं, महिलाओं तथा सामाजिक जागरण—तक विस्तार देने के लिए प्रेरित किया।

प्रमुख उपलब्धियाँ

21 वर्ष

सरसंघचालक के रूप में नेतृत्व

सेवा

सेवा कार्यों का व्यापक विस्तार

समरसता

सामाजिक एकता पर विशेष बल

राष्ट्र

राष्ट्र निर्माण का सतत प्रयास

संगठन

देशव्यापी विस्तार

प्रेरणा

लाखों स्वयंसेवकों के मार्गदर्शक

विरासत

बालासाहब देवरस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सामाजिक उत्तरदायित्व, सेवा एवं समरसता के नए आयाम प्रदान किए। उनके नेतृत्व में अनेक सेवा परियोजनाएँ प्रारम्भ हुईं तथा संगठन का समाज के विभिन्न वर्गों के साथ संवाद और अधिक सशक्त हुआ।

आज भी उनका जीवन, सादगी, सेवा, संगठन क्षमता तथा सामाजिक समरसता के प्रति समर्पण स्वयंसेवकों और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके विचार राष्ट्रहित, सामाजिक सद्भाव और सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में निरंतर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

प्रेरणादायक संदेश

"समाज की वास्तविक शक्ति उसकी एकता, सेवा भावना और पारस्परिक विश्वास में निहित होती है। जब समाज संगठित होकर राष्ट्रहित में कार्य करता है, तभी राष्ट्र प्रगति के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचता है।"

— परम पूजनीय बालासाहब देवरस

🚩 जीवन यात्रा

बालासाहब देवरस का जीवन : वर्षवार समयरेखा

परम पूजनीय बालासाहब देवरस का सम्पूर्ण जीवन संगठन, सेवा, सामाजिक समरसता एवं राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित रहा। नीचे उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत किया गया है।

1915

जन्म

11 दिसम्बर 1915 को नागपुर में जन्म हुआ। बचपन से ही अनुशासन, नेतृत्व क्षमता एवं समाज सेवा के संस्कार उनके व्यक्तित्व में स्पष्ट दिखाई देते थे।

1927

संघ से जुड़ाव

किशोरावस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से जुड़े और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के सान्निध्य में संगठनात्मक जीवन की शुरुआत की।

1939

प्रचारक जीवन

संघ के प्रचारक के रूप में संगठन विस्तार का कार्य प्रारम्भ किया तथा विभिन्न दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया।

1965–1973

सरकार्यवाह

सरकार्यवाह के रूप में संगठन के विस्तार, प्रशिक्षण व्यवस्था तथा कार्यपद्धति को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1973

तृतीय सरसंघचालक

परम पूजनीय श्री गुरुजी के पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बने और संगठन को समाज जीवन के नए आयामों तक पहुँचाया।

1975–1977

आपातकाल का दौर

आपातकाल के कठिन समय में संगठन का मार्गदर्शन किया। स्वयंसेवकों ने लोकतांत्रिक मूल्यों एवं सामाजिक जागरूकता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1980–1994

सेवा एवं समरसता

सामाजिक समरसता, सेवा परियोजनाओं, ग्राम विकास तथा समाज के प्रत्येक वर्ग तक संगठन के कार्यों का विस्तार करने पर विशेष बल दिया।

1996

महाप्रयाण

17 जून 1996 को उनका महाप्रयाण हुआ। उनका जीवन सेवा, सादगी, संगठन और सामाजिक समरसता की प्रेरणा के रूप में आज भी स्मरण किया जाता है।

1915

जन्म वर्ष

1973

सरसंघचालक बने

21 वर्ष

नेतृत्व कार्यकाल

1996

महाप्रयाण

🚩 सेवा • समरसता • संगठन

परम पूजनीय बालासाहब देवरस के प्रमुख योगदान

बालासाहब देवरस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को केवल संगठनात्मक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व, सेवा कार्य, समरसता एवं राष्ट्र निर्माण की दिशा में भी नई ऊर्जा प्रदान की। उनके नेतृत्व में संघ का कार्य समाज के अनेक क्षेत्रों तक व्यापक रूप से पहुँचा।

🤝

सामाजिक समरसता

बालासाहब देवरस ने समाज के सभी वर्गों के बीच समानता, आत्मीयता और सहयोग की भावना विकसित करने पर विशेष बल दिया। उन्होंने सामाजिक भेदभाव को समाप्त कर समरस समाज के निर्माण का संदेश दिया।

🏥

सेवा कार्यों का विस्तार

उनके नेतृत्व में शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, आपदा राहत तथा निर्धन एवं वंचित वर्गों की सहायता के लिए अनेक सेवा परियोजनाओं का विस्तार हुआ। सेवा को उन्होंने राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण आधार माना।

🚩

संगठन सुदृढ़ीकरण

उन्होंने शाखा व्यवस्था, प्रशिक्षण वर्गों एवं संगठनात्मक कार्यपद्धति को और अधिक प्रभावी बनाया। उनके कार्यकाल में संघ का विस्तार देश के अनेक नए क्षेत्रों तक हुआ।

👥

समाज के सभी वर्गों तक पहुँच

बालासाहब का प्रयास था कि समाज का प्रत्येक वर्ग राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाए। उन्होंने युवाओं, विद्यार्थियों, महिलाओं तथा ग्रामीण समाज तक संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया।

🕊

लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थन

आपातकाल के कठिन समय में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक जागरूकता तथा नागरिक उत्तरदायित्व के महत्व पर बल दिया। संगठन ने समाज में सकारात्मक चेतना जागृत करने का कार्य किया।

🌏

स्थायी प्रेरणा

उनका जीवन सादगी, अनुशासन, सेवा एवं संगठन क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है। आज भी उनके विचार और कार्यशैली लाखों स्वयंसेवकों तथा समाजसेवियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।

प्रेरणादायक संदेश

"समाज में वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब हम सेवा, समरसता और संगठन को अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं। राष्ट्र की शक्ति समाज की एकता और चरित्रवान नागरिकों में निहित होती है।"

— परम पूजनीय बालासाहब देवरस

🚩 चतुर्थ सरसंघचालक

परम पूजनीय प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)

परम पूजनीय प्रो. राजेन्द्र सिंह, जिन्हें स्नेहपूर्वक रज्जू भैया कहा जाता है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक थे। वे एक प्रसिद्ध भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक, सरल व्यक्तित्व के धनी तथा राष्ट्र जीवन के प्रति पूर्णतः समर्पित संगठनकर्ता थे। उनके नेतृत्व में संघ ने सेवा, संगठन और राष्ट्रीय जागरण के कार्यों को नई दिशा प्रदान की।

प्रो. राजेन्द्र सिंह

चतुर्थ सरसंघचालक

  • 📅 जन्म : 29 जनवरी 1922
  • 📍 जन्म स्थान : बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश
  • 🎓 शिक्षा : एम.एससी. (भौतिक विज्ञान)
  • 👨‍🏫 व्यवसाय : प्रोफेसर
  • 🚩 सरसंघचालक : 1994 – 2000
  • 🕊 महाप्रयाण : 14 जुलाई 2003

प्रारम्भिक जीवन

29 जनवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद में जन्मे प्रो. राजेन्द्र सिंह बचपन से ही अत्यंत मेधावी, सरल तथा अनुशासित थे। परिवार में शिक्षा एवं राष्ट्रभक्ति का वातावरण था, जिसने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। अध्ययन के साथ-साथ उनमें समाज सेवा एवं नेतृत्व के गुण भी विकसित होते गए।

विद्यार्थी जीवन में उन्होंने उत्कृष्ट शैक्षणिक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं और आगे चलकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। विज्ञान के क्षेत्र में उनकी विशेष पहचान बनी, किन्तु उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया।

शिक्षा एवं अध्यापन

प्रो. राजेन्द्र सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक रहे। वे अपने विद्यार्थियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय शिक्षक थे। सरल भाषा में कठिन विषयों को समझाने की उनकी शैली उन्हें एक उत्कृष्ट शिक्षाविद् के रूप में स्थापित करती थी।

उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किक सोच और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का अद्भुत समन्वय माना जाता था। उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ राष्ट्र सेवा के लिए भी प्रेरित किया।

1922

जन्म वर्ष

M.Sc.

भौतिक विज्ञान

1994

सरसंघचालक

2000

कार्यकाल पूर्ण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

विद्यार्थी जीवन के दौरान प्रो. राजेन्द्र सिंह का परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ। संघ की शाखा, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति तथा समाज संगठन के विचारों ने उन्हें अत्यंत प्रभावित किया। धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को पूर्णकालिक रूप से संघ कार्य के लिए समर्पित कर दिया।

उन्होंने उत्तर प्रदेश सहित अनेक क्षेत्रों में संगठन के विभिन्न दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। उनके सरल व्यवहार, वैज्ञानिक सोच और संगठन क्षमता के कारण वे स्वयंसेवकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहे। संघ कार्य के साथ-साथ उन्होंने समाज जीवन के अनेक क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

चतुर्थ सरसंघचालक के रूप में दायित्व

वर्ष 1994 में परम पूजनीय बालासाहब देवरस के पश्चात प्रो. राजेन्द्र सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक बने। उनके नेतृत्व में संगठन ने सेवा, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता तथा संगठनात्मक सुदृढ़ीकरण के कार्यों को निरंतर गति प्रदान की।

उन्होंने अपने कार्यकाल में संवाद, सहयोग एवं आत्मीयता को संगठन की प्रमुख शक्ति माना। उनके नेतृत्व में संघ ने युवाओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा समाज के विभिन्न वर्गों के साथ व्यापक संपर्क स्थापित किया।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं सरल व्यक्तित्व

प्रो. राजेन्द्र सिंह का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, विनम्र एवं प्रेरणादायी था। वे मानते थे कि राष्ट्र निर्माण के लिए विज्ञान, शिक्षा और संस्कार तीनों का संतुलित विकास आवश्यक है। उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण संगठनात्मक निर्णयों में भी स्पष्ट दिखाई देता था।

उन्होंने सदैव स्वयं को एक सामान्य स्वयंसेवक माना। पद की अपेक्षा सेवा और उत्तरदायित्व को अधिक महत्व देना उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान थी।

संगठन विस्तार एवं समाज जीवन

रज्जू भैया ने संघ कार्य को समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जोड़ने पर विशेष बल दिया। शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता तथा राष्ट्र जागरण से जुड़े अनेक कार्यक्रमों को उनके मार्गदर्शन में नई दिशा मिली।

उन्होंने संगठन के प्रत्येक कार्यकर्ता से आत्मीय संबंध बनाए रखे तथा संवाद की परंपरा को मजबूत किया। उनका मानना था कि संगठन की वास्तविक शक्ति उसके स्वयंसेवकों की निष्ठा, सेवा भावना और अनुशासन में निहित होती है।

प्रमुख उपलब्धियाँ

1994

सरसंघचालक बने

6 वर्ष

नेतृत्व कार्यकाल

Professor

भौतिक विज्ञान

संवाद

आत्मीय नेतृत्व शैली

समरसता

सामाजिक एकता

राष्ट्र

सेवा एवं संगठन

विरासत

प्रो. राजेन्द्र सिंह ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि महान नेतृत्व का आधार सरलता, सादगी और सेवा भावना है। उनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के प्रति समर्पण, संगठन निर्माण तथा समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने का प्रेरणादायक उदाहरण है।

आज भी उनके विचार, कार्यशैली और जीवन मूल्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों सहित समाज के अनेक लोगों को राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रेरणादायक संदेश

"संगठन की सबसे बड़ी पूँजी उसके कार्यकर्ताओं का चरित्र, सेवा भावना और समाज के प्रति समर्पण होता है। जब प्रत्येक स्वयंसेवक स्वयं को राष्ट्र का सेवक मानकर कार्य करता है, तब राष्ट्र निरंतर प्रगति करता है।"

— परम पूजनीय प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)

🚩 जीवन यात्रा

प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) का जीवन : वर्षवार समयरेखा

प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) का जीवन शिक्षा, विज्ञान, संगठन, सेवा और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत समन्वय था। नीचे उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत किया गया है।

1922

जन्म

29 जनवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद में जन्म हुआ। बचपन से ही वे मेधावी, अनुशासित एवं राष्ट्रप्रेमी स्वभाव के थे।

1940 का दशक

उच्च शिक्षा

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की तथा उत्कृष्ट छात्र के रूप में अपनी पहचान बनाई।

प्रारम्भिक सेवा

प्रोफेसर बने

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक बने। वे अपने सरल स्वभाव और उत्कृष्ट अध्यापन शैली के कारण विद्यार्थियों में अत्यंत लोकप्रिय रहे।

संघ जीवन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

संघ के स्वयंसेवक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया तथा उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न क्षेत्रों में संगठनात्मक दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया।

1994

चतुर्थ सरसंघचालक

परम पूजनीय बालासाहब देवरस के पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक बने और संगठन को संवाद, सेवा तथा समरसता की नई दिशा प्रदान की।

1994–2000

नेतृत्व काल

अपने कार्यकाल में संगठन विस्तार, सेवा कार्य, युवाओं के मार्गदर्शन तथा समाज के विभिन्न वर्गों से आत्मीय संवाद स्थापित करने पर विशेष बल दिया।

2000

उत्तरदायित्व का हस्तांतरण

स्वास्थ्य संबंधी कारणों से सरसंघचालक का दायित्व परम पूजनीय कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन जी को सौंपकर संगठन की परंपरा का अनुकरण किया।

2003

महाप्रयाण

14 जुलाई 2003 को उनका महाप्रयाण हुआ। उनका जीवन सादगी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, राष्ट्रभक्ति और संगठन समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है।

1922

जन्म

Professor

भौतिक विज्ञान

1994

सरसंघचालक बने

2003

महाप्रयाण

🚩 योगदान एवं प्रेरणा

परम पूजनीय प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) के प्रमुख योगदान

रज्जू भैया ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक के रूप में संगठन को सरलता, आत्मीयता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नई दिशा प्रदान की। उनका सम्पूर्ण जीवन शिक्षा, सेवा, संगठन तथा राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित रहा।

🎓

शिक्षा एवं संस्कार

रज्जू भैया एक उत्कृष्ट भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक थे। उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण का आधार माना। उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित किया।

🤝

सरल एवं आत्मीय नेतृत्व

उनकी नेतृत्व शैली अत्यंत सरल, विनम्र एवं आत्मीय थी। वे प्रत्येक स्वयंसेवक से व्यक्तिगत संबंध बनाए रखने में विश्वास रखते थे और संवाद के माध्यम से संगठन को मजबूत बनाते थे।

🚩

संगठन का विस्तार

उनके कार्यकाल में शाखाओं, प्रशिक्षण वर्गों तथा सेवा गतिविधियों को निरंतर गति मिली। उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों तक संघ के कार्यों को पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

⚖️

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

उन्होंने विज्ञान और भारतीय संस्कृति के संतुलित समन्वय पर बल दिया। उनका मानना था कि आधुनिक ज्ञान और भारतीय मूल्य मिलकर राष्ट्र को सशक्त बना सकते हैं।

❤️

समरस समाज का संदेश

उन्होंने समाज के प्रत्येक वर्ग को साथ लेकर चलने, पारस्परिक सम्मान बढ़ाने तथा सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने का संदेश दिया। उनके विचारों में सेवा और सहयोग का विशेष स्थान था।

🌍

स्थायी प्रेरणा

उनका जीवन आज भी लाखों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। सादगी, सेवा, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताएँ थीं।

प्रेरणादायक संदेश

"ज्ञान तभी सार्थक है जब वह समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पित हो। एक स्वयंसेवक का जीवन सेवा, सादगी और राष्ट्रभक्ति का आदर्श होना चाहिए।"

— परम पूजनीय प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)

🚩 पंचम सरसंघचालक

परम पूजनीय कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन

परम पूजनीय कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन (के. एस. सुदर्शन) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंचम सरसंघचालक थे। वर्ष 2000 में उन्होंने यह दायित्व ग्रहण किया। वे दूरदर्शी चिंतक, प्रखर वक्ता, स्वदेशी विचारधारा के समर्थक तथा संगठन के कुशल मार्गदर्शक थे। उनके नेतृत्व में संघ ने राष्ट्र निर्माण, स्वदेशी, तकनीकी आत्मनिर्भरता एवं सामाजिक जागरण के अनेक विषयों पर व्यापक कार्य किया।

के. एस. सुदर्शन

पंचम सरसंघचालक

  • 📅 जन्म : 18 जून 1931
  • 📍 जन्म स्थान : रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़)
  • 🎓 शिक्षा : बी.ई. (दूरसंचार इंजीनियरिंग)
  • 🚩 सरसंघचालक : 2000 – 2009
  • 🌍 कार्यकाल : लगभग 9 वर्ष
  • 🕊 महाप्रयाण : 15 सितम्बर 2012

प्रारम्भिक जीवन

18 जून 1931 को रायपुर में जन्मे कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन बचपन से ही मेधावी, अनुशासित एवं राष्ट्रभक्ति की भावना से प्रेरित थे। परिवार में भारतीय संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों का वातावरण था, जिसने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। प्रारम्भ से ही अध्ययन, अनुशासन तथा सामाजिक उत्तरदायित्व उनके जीवन का महत्वपूर्ण भाग रहे।

युवा अवस्था में उनका झुकाव राष्ट्रीय विचारों की ओर बढ़ा और उन्होंने राष्ट्र सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। उनकी तार्किक सोच, अध्ययनशील प्रवृत्ति तथा नेतृत्व क्षमता ने उन्हें शीघ्र ही संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं में स्थापित कर दिया।

शिक्षा एवं व्यक्तित्व

उन्होंने दूरसंचार इंजीनियरिंग (Telecommunication Engineering) की शिक्षा प्राप्त की। तकनीकी शिक्षा प्राप्त होने के बावजूद उन्होंने व्यक्तिगत करियर के स्थान पर राष्ट्र सेवा का मार्ग चुना और पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में स्वयं को समर्पित कर दिया।

के. एस. सुदर्शन भारतीय संस्कृति, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अर्थनीति तथा राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों के गंभीर अध्येता थे। वे बहुभाषी, प्रभावशाली वक्ता तथा दूरदर्शी विचारक के रूप में व्यापक रूप से सम्मानित थे।

1931

जन्म वर्ष

B.E.

इंजीनियरिंग शिक्षा

2000

सरसंघचालक बने

9 वर्ष

नेतृत्व कार्यकाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

युवा अवस्था में ही कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए। संघ की शाखा, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति तथा चरित्र निर्माण की कार्यपद्धति ने उन्हें अत्यंत प्रभावित किया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन की अपेक्षा राष्ट्र सेवा को अधिक महत्वपूर्ण मानते हुए पूर्णकालिक प्रचारक बनने का निर्णय लिया।

उन्होंने मध्य भारत, पूर्वोत्तर भारत तथा विभिन्न प्रांतों में संगठन के अनेक दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। अपनी संगठन क्षमता, अध्ययनशीलता तथा समर्पण के कारण वे शीघ्र ही संघ के प्रमुख दायित्वों तक पहुँचे।

पंचम सरसंघचालक के रूप में दायित्व

वर्ष 2000 में परम पूजनीय प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) द्वारा दायित्व हस्तांतरण के पश्चात के. एस. सुदर्शन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंचम सरसंघचालक बने। उन्होंने संगठन को आधुनिक चुनौतियों के अनुरूप नई दिशा प्रदान करने का प्रयास किया।

उनके नेतृत्व में स्वदेशी चिंतन, तकनीकी आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक जागरण, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श और जनजागरण को विशेष महत्व मिला।

स्वदेशी एवं आत्मनिर्भर भारत का दृष्टिकोण

सुदर्शन जी का मानना था कि भारत का सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब देश आर्थिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी दृष्टि से आत्मनिर्भर बने। उन्होंने स्वदेशी उद्योग, भारतीय तकनीक, स्थानीय उत्पादन तथा आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के समर्थन में अनेक प्रेरणादायक विचार प्रस्तुत किए।

उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के संतुलित समन्वय पर बल देते हुए युवाओं को नवाचार, अनुसंधान तथा राष्ट्रहित में तकनीक के उपयोग के लिए प्रेरित किया।

विचारक एवं प्रेरक वक्ता

के. एस. सुदर्शन केवल एक संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि गहन अध्ययन करने वाले विचारक भी थे। भारतीय संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण, कृषि, शिक्षा तथा सामाजिक विषयों पर उनका गहरा अध्ययन था।

वे अनेक भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेज़ी में भी प्रभावशाली वक्ता थे। उनके व्याख्यानों में तार्किक विश्लेषण, ऐतिहासिक संदर्भ तथा राष्ट्रहित की स्पष्ट दृष्टि दिखाई देती थी।

प्रमुख उपलब्धियाँ

2000

पंचम सरसंघचालक

9 वर्ष

नेतृत्व कार्यकाल

स्वदेशी

आर्थिक आत्मनिर्भरता

Technology

तकनीकी जागरूकता

Environment

पर्यावरण संरक्षण

राष्ट्रीय सुरक्षा

सशक्त भारत का दृष्टिकोण

विरासत

के. एस. सुदर्शन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को समकालीन राष्ट्रीय चुनौतियों से जोड़ते हुए स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, विज्ञान एवं भारतीय संस्कृति के समन्वय पर विशेष बल दिया। उनके विचार आज भी अनेक स्वयंसेवकों, शिक्षकों, युवाओं तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

उनका जीवन राष्ट्रहित, अनुशासन, सादगी तथा दूरदर्शी नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने संगठन को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप सोचने और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचने की प्रेरणा दी।

प्रेरणादायक संदेश

"स्वदेशी केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार है। जब समाज अपनी संस्कृति, विज्ञान और संसाधनों पर विश्वास करता है, तभी वह विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता प्राप्त करता है।"

— परम पूजनीय के. एस. सुदर्शन

🚩 जीवन यात्रा

परम पूजनीय के. एस. सुदर्शन जी का जीवन : वर्षवार समयरेखा

परम पूजनीय के. एस. सुदर्शन का जीवन राष्ट्रभक्ति, संगठन, स्वदेशी चिंतन, तकनीकी आत्मनिर्भरता तथा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। नीचे उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत किया गया है।

1931

जन्म

18 जून 1931 को रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) में जन्म हुआ। प्रारम्भ से ही अध्ययन, अनुशासन एवं राष्ट्रसेवा के प्रति उनकी विशेष रुचि थी।

1950 का दशक

इंजीनियरिंग शिक्षा

दूरसंचार इंजीनियरिंग (Telecommunication Engineering) की शिक्षा प्राप्त की। तकनीकी ज्ञान के साथ भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय विचारों का गहन अध्ययन किया।

1954

पूर्णकालिक प्रचारक

व्यक्तिगत करियर के स्थान पर राष्ट्रसेवा का मार्ग चुनते हुए पूर्णकालिक प्रचारक बने और विभिन्न प्रांतों में संगठन विस्तार का कार्य किया।

1979

अखिल भारतीय दायित्व

संगठन के विभिन्न अखिल भारतीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए वैचारिक मार्गदर्शन, प्रशिक्षण एवं संगठन विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2000

पंचम सरसंघचालक

परम पूजनीय प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) के पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंचम सरसंघचालक बने और संगठन को नई वैचारिक दिशा प्रदान की।

2000–2009

स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता

अपने कार्यकाल में स्वदेशी, आर्थिक आत्मनिर्भरता, विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सांस्कृतिक जागरण जैसे विषयों पर व्यापक जनजागरण किया।

2009

दायित्व हस्तांतरण

सरसंघचालक का दायित्व परम पूजनीय डॉ. मोहन भागवत को सौंपकर संगठन की उत्तरदायित्व परंपरा को आगे बढ़ाया।

2012

महाप्रयाण

15 सितम्बर 2012 को उनका महाप्रयाण हुआ। उनका जीवन स्वदेशी, संगठन, राष्ट्रभक्ति एवं दूरदर्शी नेतृत्व का प्रेरणादायी उदाहरण है।

1931

जन्म

B.E.

दूरसंचार इंजीनियरिंग

2000

पंचम सरसंघचालक

2012

महाप्रयाण

🚩 प्रमुख योगदान

परम पूजनीय के. एस. सुदर्शन जी के प्रमुख योगदान एवं विचार

परम पूजनीय के. एस. सुदर्शन जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंचम सरसंघचालक के रूप में संगठन को समकालीन राष्ट्रीय चुनौतियों के अनुरूप नई वैचारिक दिशा प्रदान की। उन्होंने स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, विज्ञान, पर्यावरण, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सांस्कृतिक जागरण जैसे विषयों को समाज के समक्ष प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया।

🇮🇳

स्वदेशी का समर्थन

सुदर्शन जी का मानना था कि भारत की आर्थिक एवं सांस्कृतिक उन्नति का आधार स्वदेशी व्यवस्था है। उन्होंने स्थानीय उद्योग, भारतीय उत्पादों तथा आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का सतत संदेश दिया।

💡

तकनीकी आत्मनिर्भरता

उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण साधन माना। उनका विश्वास था कि आधुनिक तकनीक का उपयोग भारतीय मूल्यों के साथ किया जाए ताकि देश आत्मनिर्भर और सशक्त बन सके।

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पर्यावरण संरक्षण

सुदर्शन जी ने पर्यावरण संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा सतत विकास पर विशेष बल दिया। उन्होंने भारतीय जीवन शैली को पर्यावरण अनुकूल बताया और समाज को प्रकृति के प्रति उत्तरदायी बनने की प्रेरणा दी।

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राष्ट्रीय सुरक्षा

उन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा को केवल सैन्य शक्ति तक सीमित न मानकर सामाजिक एकता, आर्थिक मजबूती, सांस्कृतिक आत्मविश्वास एवं वैज्ञानिक प्रगति से भी जोड़ा। उनके विचारों में सशक्त भारत ही सुरक्षित भारत है।

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वैचारिक नेतृत्व

सुदर्शन जी भारतीय संस्कृति, इतिहास, अर्थव्यवस्था, विज्ञान और सामाजिक विषयों के गंभीर अध्येता थे। उन्होंने अनेक व्याख्यानों के माध्यम से स्वयंसेवकों एवं समाज को राष्ट्रहित के विभिन्न आयामों पर मार्गदर्शन प्रदान किया।

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संगठन का सुदृढ़ीकरण

उनके नेतृत्व में संगठन ने सेवा, शिक्षा, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा समाज जागरण के अनेक क्षेत्रों में कार्यों का विस्तार किया। उन्होंने प्रत्येक स्वयंसेवक को समाज जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।

प्रेरणादायक विचार

"आत्मनिर्भर राष्ट्र वही होता है जो अपनी संस्कृति, विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था और समाज पर विश्वास रखता है। स्वदेशी केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रतीक है।"

— परम पूजनीय के. एस. सुदर्शन

🚩 षष्ठम एवं वर्तमान सरसंघचालक

परम पूजनीय डॉ. मोहनराव भागवत

परम पूजनीय डॉ. मोहनराव मधुकरराव भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान एवं षष्ठम सरसंघचालक हैं। वर्ष 2009 से उनके नेतृत्व में संघ संगठन विस्तार, सामाजिक समरसता, सेवा, पर्यावरण संरक्षण, परिवार प्रबोधन, ग्राम विकास, कुटुंब प्रबोधन तथा राष्ट्रीय पुनर्जागरण के अनेक क्षेत्रों में निरंतर कार्य कर रहा है।

डॉ. मोहनराव भागवत

वर्तमान सरसंघचालक

  • 📅 जन्म : 11 सितम्बर 1950
  • 📍 जन्म : चंद्रपुर, महाराष्ट्र
  • 🎓 शिक्षा : पशु चिकित्सा विज्ञान (B.V.Sc.)
  • 🚩 सरसंघचालक : 2009 – वर्तमान
  • 🌍 वर्तमान सर्वोच्च मार्गदर्शक
  • ⭐ संगठन विस्तार एवं सामाजिक समरसता

प्रारम्भिक जीवन

11 सितम्बर 1950 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में जन्मे डॉ. मोहन भागवत ऐसे परिवार में पले-बढ़े जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार प्रारम्भ से ही विद्यमान थे। उनके माता-पिता स्वयं समाज एवं राष्ट्रकार्य से जुड़े हुए थे, जिसके कारण बचपन से ही उनमें अनुशासन, सेवा, राष्ट्रभक्ति एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित हुई।

विद्यालय जीवन से ही वे नियमित शाखा जाते थे। खेल, अध्ययन, अनुशासन एवं नेतृत्व क्षमता के कारण वे अपने साथियों के बीच विशेष पहचान रखते थे। युवावस्था में ही उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया।

शिक्षा एवं व्यक्तित्व

उन्होंने नागपुर पशु चिकित्सा महाविद्यालय से पशु चिकित्सा विज्ञान (Veterinary Science) की शिक्षा प्राप्त की। उच्च शिक्षा के दौरान भी उनका झुकाव समाज सेवा एवं संगठनात्मक कार्यों की ओर निरंतर बढ़ता गया।

डॉ. मोहन भागवत सरल, सहज, स्पष्टवादी तथा दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी हैं। वे संवाद, समन्वय और समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ सकारात्मक सहभागिता को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके नेतृत्व में संघ ने आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप अनेक नए विषयों पर समाज के साथ संवाद स्थापित किया है।

1950

जन्म वर्ष

B.V.Sc.

पशु चिकित्सा शिक्षा

2009

सरसंघचालक बने

वर्तमान

संघ का नेतृत्व

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

डॉ. मोहनराव भागवत बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से जुड़े रहे। परिवार में संघ के संस्कार होने के कारण राष्ट्रसेवा, अनुशासन तथा सामाजिक उत्तरदायित्व उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा बन गए। विद्यार्थी जीवन में उन्होंने नियमित शाखा, प्रशिक्षण वर्गों एवं संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने व्यक्तिगत करियर के स्थान पर राष्ट्रकार्य को प्राथमिकता दी और पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने विभिन्न प्रांतों एवं दायित्वों में कार्य करते हुए संगठन के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सरसंघचालक के रूप में दायित्व

मार्च 2009 में परम पूजनीय के. एस. सुदर्शन जी द्वारा दायित्व हस्तांतरण के पश्चात डॉ. मोहन भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के षष्ठम एवं वर्तमान सरसंघचालक बने। उनके नेतृत्व में संघ ने संगठन विस्तार के साथ-साथ समाज जीवन के अनेक विषयों पर व्यापक संवाद स्थापित किया।

उनके मार्गदर्शन में सेवा, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण, परिवार प्रबोधन, सामाजिक समरसता, कुटुंब व्यवस्था, महिला सहभागिता, युवा जागरण तथा आत्मनिर्भर भारत जैसे विषयों पर अनेक रचनात्मक कार्यों का विस्तार हुआ।

नेतृत्व शैली

डॉ. मोहन भागवत संवाद आधारित नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं। वे समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ सकारात्मक चर्चा, विचार-विमर्श एवं सहयोग की भावना को महत्व देते हैं। उनका मानना है कि राष्ट्र निर्माण केवल किसी एक संगठन का कार्य नहीं बल्कि सम्पूर्ण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

वे समय-समय पर शिक्षा, पर्यावरण, परिवार, संस्कृति, विज्ञान, तकनीक, सामाजिक समरसता, महिला सशक्तिकरण तथा युवा शक्ति जैसे समकालीन विषयों पर अपने विचार रखते हैं और समाज को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास करते हैं।

सामाजिक समरसता एवं सेवा

डॉ. मोहन भागवत के नेतृत्व में समाज के सभी वर्गों के बीच समरसता, सहयोग एवं आत्मीयता बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया है। उनका मानना है कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता तथा समाज की पारस्परिक सद्भावना में है।

उन्होंने सेवा कार्यों, आपदा राहत, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण एवं स्वावलंबन से जुड़े अनेक प्रयासों को प्रोत्साहित किया। समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुँचाना उनके नेतृत्व की प्रमुख विशेषताओं में से एक है।

प्रमुख उपलब्धियाँ

2009

सरसंघचालक बने

वर्तमान

राष्ट्रीय नेतृत्व

संवाद

समाज से व्यापक संपर्क

सेवा

रचनात्मक कार्यों का विस्तार

समरसता

सामाजिक एकात्मता

युवा शक्ति

राष्ट्र निर्माण का आह्वान

वर्तमान नेतृत्व एवं दृष्टिकोण

डॉ. मोहन भागवत के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निरंतर संगठन विस्तार, सेवा, पर्यावरण संरक्षण, ग्राम विकास, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय पुनर्जागरण के विभिन्न आयामों पर कार्य कर रहा है। वे आत्मनिर्भर, संगठित, संस्कारित एवं सक्षम भारत की कल्पना को समाज के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।

उनका विश्वास है कि जब प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करेगा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाएगा, तभी भारत विश्व में ज्ञान, संस्कृति और मानवता का प्रभावी नेतृत्व कर सकेगा।

प्रेरणादायक संदेश

"भारत का भविष्य समाज की एकता, सेवा भावना, आत्मविश्वास और संस्कारित नागरिकों पर आधारित है। जब समाज स्वयं आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण का दायित्व निभाता है, तब परिवर्तन स्थायी और व्यापक होता है।"

— परम पूजनीय डॉ. मोहनराव भागवत

🚩 जीवन यात्रा

परम पूजनीय डॉ. मोहनराव भागवत का जीवन : वर्षवार समयरेखा

परम पूजनीय डॉ. मोहनराव भागवत का जीवन राष्ट्रसेवा, संगठन, सामाजिक समरसता, सेवा, संवाद तथा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। नीचे उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत किया गया है।

1950

जन्म

11 सितम्बर 1950 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में जन्म हुआ। बचपन से ही परिवार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार प्राप्त हुए।

1960–1970

शाखा एवं शिक्षा

विद्यालय जीवन से नियमित शाखा जाते रहे। पशु चिकित्सा विज्ञान (Veterinary Science) की शिक्षा प्राप्त करते हुए राष्ट्रकार्य में सक्रिय रहे।

1975

पूर्णकालिक प्रचारक

व्यक्तिगत करियर छोड़कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बने तथा विभिन्न प्रांतों में संगठनात्मक कार्यों का दायित्व संभाला।

1991

अखिल भारतीय दायित्व

संघ के विभिन्न अखिल भारतीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए संगठन विस्तार, प्रशिक्षण तथा कार्यकर्ता निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2000

सरकार्यवाह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह बने और संगठन की कार्ययोजना, सेवा गतिविधियों एवं विस्तार कार्यों को नई गति प्रदान की।

2009

षष्ठम सरसंघचालक

परम पूजनीय के. एस. सुदर्शन जी के पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के षष्ठम एवं वर्तमान सरसंघचालक बने।

2009 – वर्तमान

वर्तमान नेतृत्व

उनके नेतृत्व में सामाजिक समरसता, ग्राम विकास, परिवार प्रबोधन, सेवा कार्य, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भर भारत तथा युवाओं के राष्ट्र निर्माण में योगदान जैसे अनेक विषयों पर व्यापक कार्य हो रहा है।

वर्तमान

राष्ट्र जीवन का मार्गदर्शन

देशभर में प्रवास, स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन, विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के साथ संवाद तथा राष्ट्रहित के समकालीन विषयों पर विचार प्रस्तुत करते हुए निरंतर संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं।

1950

जन्म

1975

पूर्णकालिक प्रचारक

2009

सरसंघचालक बने

वर्तमान

राष्ट्रीय नेतृत्व

🚩 वर्तमान नेतृत्व एवं योगदान

परम पूजनीय डॉ. मोहनराव भागवत के प्रमुख योगदान

परम पूजनीय डॉ. मोहन भागवत के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने संगठन विस्तार के साथ-साथ समाज जीवन के अनेक क्षेत्रों में रचनात्मक कार्यों को गति प्रदान की है। सेवा, सामाजिक समरसता, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण, परिवार प्रबोधन तथा राष्ट्रीय जागरण उनके नेतृत्व की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

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सामाजिक समरसता

डॉ. मोहन भागवत समाज के प्रत्येक वर्ग के बीच संवाद, सहयोग और आत्मीयता को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला मानते हैं। उनके नेतृत्व में सामाजिक समरसता, सद्भाव एवं एकात्मता को सुदृढ़ करने के अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।

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ग्राम विकास एवं स्वावलंबन

ग्राम विकास, जैविक खेती, जल संरक्षण, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता तथा स्थानीय संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर विशेष बल दिया गया है। उद्देश्य है कि प्रत्येक गाँव सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सशक्त बने।

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सेवा कार्यों का विस्तार

शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, जनजातीय क्षेत्रों का विकास, निर्धन एवं वंचित समाज की सहायता तथा विभिन्न सेवा परियोजनाओं को निरंतर प्रोत्साहन मिला है। सेवा को समाज परिवर्तन का प्रभावी माध्यम माना गया है।

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परिवार प्रबोधन

भारतीय परिवार व्यवस्था को समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई मानते हुए परिवारों में संस्कार, संवाद, पारस्परिक सम्मान तथा सामाजिक उत्तरदायित्व को मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया है।

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पर्यावरण एवं प्रकृति संरक्षण

जल, जंगल, जमीन, जैव विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक दायित्व बताते हुए वृक्षारोपण, जल संरक्षण तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन शैली अपनाने का संदेश दिया जाता है।

🎓

युवा शक्ति एवं राष्ट्र निर्माण

डॉ. मोहन भागवत युवाओं को चरित्रवान, अनुशासित, आत्मनिर्भर एवं राष्ट्रहित में कार्य करने वाला नागरिक बनने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके विचारों में युवा शक्ति भारत के भविष्य की सबसे बड़ी ताकत है।

2009

सरसंघचालक के रूप में दायित्व

सेवा

समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँच

संवाद

सकारात्मक राष्ट्रीय विमर्श

वर्तमान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व

प्रेरणादायक संदेश

"भारत की शक्ति उसके संगठित समाज, संस्कारित परिवारों, जागरूक युवाओं और सेवा भाव से प्रेरित नागरिकों में निहित है। जब प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र को अपना परिवार मानकर कार्य करेगा, तब भारत विश्व के लिए प्रेरणा बनेगा।"

— परम पूजनीय डॉ. मोहनराव भागवत

❓ सामान्य प्रश्न (FAQ)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालकों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न

यहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालकों से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर सरल एवं व्यवस्थित रूप में दिए गए हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कब हुई?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना विजयादशमी के दिन 27 सितम्बर 1925 (कुछ संदर्भों में 1925 की विजयादशमी) को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर में की गई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक कौन हैं?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार हैं।
अब तक कितने सरसंघचालक हुए हैं?
अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छह सरसंघचालक हुए हैं—डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर), बालासाहब देवरस, प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया), के. एस. सुदर्शन तथा वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत।
वर्तमान सरसंघचालक कौन हैं?
वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. मोहनराव भागवत हैं।
सरसंघचालक का चयन कैसे होता है?
संघ की परंपरा के अनुसार वर्तमान सरसंघचालक संगठन की आवश्यकता और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श के आधार पर अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करते हैं।
सरसंघचालक का मुख्य कार्य क्या होता है?
सरसंघचालक संघ का सर्वोच्च वैचारिक एवं संगठनात्मक मार्गदर्शक होता है। वह संगठन की दिशा, विचार और कार्यपद्धति का मार्गदर्शन करता है।
क्या सरसंघचालक का कार्यकाल निश्चित होता है?
नहीं। संघ में सरसंघचालक का कार्यकाल किसी निश्चित अवधि से बंधा नहीं होता। आवश्यकता एवं परिस्थितियों के अनुसार उत्तरदायित्व का हस्तांतरण किया जाता है।
संघ का उद्देश्य क्या है?
संघ का उद्देश्य समाज का संगठन, चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय चेतना का विकास तथा सेवा एवं संस्कारों के माध्यम से राष्ट्र जीवन को सशक्त बनाना है।
संघ की शाखा क्या होती है?
शाखा संघ की मूल कार्यपद्धति है जहाँ स्वयंसेवक नियमित रूप से शारीरिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण करते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्येय वाक्य क्या है?
संघ का मूल ध्येय संगठित, संस्कारित एवं सशक्त समाज का निर्माण करना है जो राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में सक्रिय भूमिका निभाए।
संघ में स्वयंसेवक कैसे बन सकते हैं?
कोई भी इच्छुक व्यक्ति अपने निकट की शाखा में जाकर नियमित रूप से शाखा गतिविधियों में भाग लेकर स्वयंसेवक बन सकता है।
क्या संघ केवल भारत में कार्य करता है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्य कार्य भारत में है, जबकि विभिन्न देशों में भारतीय समाज के बीच प्रेरणा से कार्य करने वाले अलग-अलग संगठन सक्रिय हैं।
संघ की प्रार्थना किस भाषा में है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वर्तमान प्रार्थना संस्कृत भाषा में है और प्रत्येक शाखा में निर्धारित परंपरा के अनुसार गाई जाती है।
संघ का भगवा ध्वज क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
भगवा ध्वज त्याग, तपस्या, सेवा, ज्ञान एवं भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है। संघ में इसे गुरु के रूप में सम्मान दिया जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय कहाँ है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय महाराष्ट्र के नागपुर शहर में स्थित है।

🚩 निष्कर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लगभग एक शताब्दी का इतिहास राष्ट्र सेवा, संगठन निर्माण, चरित्र निर्माण तथा सामाजिक जागरण की निरंतर यात्रा का साक्षी रहा है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित इस संगठन का नेतृत्व समय-समय पर विभिन्न सरसंघचालकों ने संभाला और प्रत्येक ने अपने विचार, व्यक्तित्व एवं कार्यशैली के माध्यम से संगठन को नई दिशा प्रदान की।

श्री गुरुजी ने संगठन का राष्ट्रव्यापी विस्तार किया, बालासाहब देवरस ने सामाजिक समरसता एवं सेवा कार्यों को नई गति दी, रज्जू भैया ने सरलता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नेतृत्व किया, के. एस. सुदर्शन जी ने स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता का संदेश दिया तथा वर्तमान सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. मोहनराव भागवत के नेतृत्व में संघ सेवा, सामाजिक समरसता, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण एवं राष्ट्र निर्माण के विविध क्षेत्रों में निरंतर कार्य कर रहा है।

इन सभी सरसंघचालकों का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि राष्ट्र निर्माण केवल विचारों से नहीं, बल्कि अनुशासन, सेवा, त्याग, समर्पण और संगठित समाज के सामूहिक प्रयास से संभव होता है। यही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति का मूल आधार है।

प्रेरणादायक संदेश

"राष्ट्र सर्वोपरि है। जब समाज संगठित, संस्कारित और सेवा भाव से प्रेरित होकर कार्य करता है, तब एक सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण संभव होता है।"

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✍️ लेखक परिचय

स्वयंसेवक | संघ आयु : 23 वर्ष

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