सरसंघचालक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर्वोच्च मार्गदर्शक एवं वैचारिक नेतृत्वकर्ता
सरसंघचालक कौन होते हैं?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में सरसंघचालक संगठन के सर्वोच्च मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत होते हैं। वे संघ की विचारधारा, कार्यपद्धति तथा दीर्घकालीन दिशा का मार्गदर्शन करते हैं। संगठन के सभी स्वयंसेवकों के लिए उनका जीवन सेवा, समर्पण, अनुशासन एवं राष्ट्रभक्ति का प्रेरणादायक उदाहरण माना जाता है।
वर्ष 1925 में संघ की स्थापना परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। तब से लेकर वर्तमान तक सभी सरसंघचालकों ने संगठन के विस्तार, राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता, सेवा कार्य तथा सांस्कृतिक जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इस पृष्ठ पर आपको संघ के सभी सरसंघचालकों का जीवन परिचय, कार्यकाल, प्रमुख उपलब्धियाँ, प्रेरणादायक विचार एवं ऐतिहासिक योगदान एक ही स्थान पर सरल एवं व्यवस्थित रूप में प्राप्त होगा।
1925
संघ स्थापना6
सरसंघचालक100+
वर्षों की यात्रावर्तमान
डॉ. मोहन भागवतराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी सरसंघचालक
वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के बाद से अब तक विभिन्न सरसंघचालकों ने अपने नेतृत्व, संगठन क्षमता एवं राष्ट्र समर्पण के माध्यम से संघ को नई दिशा प्रदान की है। नीचे सभी सरसंघचालकों की कार्यकाल अनुसार सूची दी गई है।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
1925 – 1940राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक।
माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी)
1940 – 1973संघ के वैचारिक विस्तार एवं संगठन सुदृढ़ीकरण का महत्वपूर्ण कार्य।
बालासाहब देवरस
1973 – 1994सामाजिक समरसता एवं सेवा कार्यों को नई गति प्रदान की।
प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)
1994 – 2000सरल व्यक्तित्व एवं वैज्ञानिक सोच के लिए प्रसिद्ध।
के. एस. सुदर्शन
2000 – 2009स्वदेशी विचार, संगठन विस्तार एवं बौद्धिक नेतृत्व।
डॉ. मोहन भागवत
2009 – वर्तमानवर्तमान सरसंघचालक एवं संगठन के सर्वोच्च मार्गदर्शक।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी सरसंघचालकों की समयरेखा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई। तब से लेकर वर्तमान तक विभिन्न सरसंघचालकों ने अपने नेतृत्व, संगठन क्षमता, राष्ट्रभक्ति एवं समाज सेवा के माध्यम से संघ को नई दिशा प्रदान की। नीचे सभी सरसंघचालकों का कार्यकाल क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत है।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
1925 – 1940
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक। उन्होंने विजयादशमी 1925 को संघ की स्थापना की और राष्ट्र जीवन में संगठन की नई दिशा प्रदान की।
माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी)
1940 – 1973
संघ के द्वितीय सरसंघचालक। उन्होंने संघ के वैचारिक विस्तार, संगठन निर्माण एवं अखिल भारतीय स्वरूप को मजबूत किया।
बालासाहब देवरस
1973 – 1994
सामाजिक समरसता, सेवा कार्य एवं समाज के विभिन्न वर्गों तक संघ के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)
1994 – 2000
सरल व्यक्तित्व, वैज्ञानिक सोच एवं संगठनात्मक क्षमता के कारण संघ के इतिहास में उनका विशेष स्थान है।
के. एस. सुदर्शन
2000 – 2009
स्वदेशी चिंतन, बौद्धिक नेतृत्व एवं संगठनात्मक नवाचारों के माध्यम से संघ को नई ऊर्जा प्रदान की।
डॉ. मोहन भागवत
2009 – वर्तमान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक। उनके नेतृत्व में सेवा, सामाजिक समरसता एवं संगठन विस्तार के अनेक कार्य निरंतर चल रहे हैं।
परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने वर्ष 1925 में संघ की स्थापना कर संगठित एवं सशक्त राष्ट्र निर्माण का आधार रखा। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा, संगठन और चरित्र निर्माण को समर्पित रहा।
डॉ. केशव
बलिराम हेडगेवार
प्रथम सरसंघचालक
संक्षिप्त जीवन परिचय
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर में हुआ। बचपन से ही उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल थी। उन्होंने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया तथा स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए एक सशक्त, अनुशासित एवं संगठित समाज की आवश्यकता को अनुभव किया।
विजयादशमी के पावन अवसर पर वर्ष 1925 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उनका उद्देश्य समाज को जाति, भाषा, प्रांत और अन्य भेदों से ऊपर उठाकर राष्ट्रहित के लिए संगठित करना था। उनके नेतृत्व में संघ ने चरित्र निर्माण, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति को अपना मूल आधार बनाया।
1889
जन्म
1925
संघ की स्थापना
15 वर्ष
प्रथम सरसंघचालक
1940
महाप्रयाण
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की जीवन यात्रा
राष्ट्रभक्ति, संगठन, अनुशासन और समाज सेवा के आदर्शों से प्रेरित डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का सम्पूर्ण जीवन भारत माता की सेवा के लिए समर्पित रहा। नीचे उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है।
जन्म
1 अप्रैल 1889 को नागपुर में जन्म हुआ। बचपन से ही उनमें राष्ट्रभक्ति, आत्मसम्मान और नेतृत्व क्षमता के गुण दिखाई देने लगे थे।
देशभक्ति की शुरुआत
विद्यार्थी जीवन में ही विदेशी शासन का विरोध किया तथा 'वंदे मातरम्' आंदोलन सहित अनेक राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय रहे।
चिकित्सा शिक्षा
राष्ट्रीय मेडिकल कॉलेज, कोलकाता से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। इसी दौरान अनेक क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादी विचारों से उनका गहरा संपर्क हुआ।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना
विजयादशमी के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर संगठित, चरित्रवान एवं राष्ट्रनिष्ठ समाज निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया।
महाप्रयाण
21 जून 1940 को उनका महाप्रयाण हुआ। उनके द्वारा स्थापित संगठन आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक माना जाता है।
1889
जन्म वर्ष
1925
संघ स्थापना
15 वर्ष
प्रथम सरसंघचालक का कार्यकाल
1940
महाप्रयाण
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जीवन परिचय
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक थे। उनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रभक्ति, संगठन निर्माण, चरित्र निर्माण और समाज सेवा के आदर्शों को समर्पित रहा। उन्होंने संगठित हिन्दू समाज के माध्यम से सशक्त भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
संघ संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक
- 📅 जन्म : 1 अप्रैल 1889
- 📍 जन्म स्थान : नागपुर
- 🎓 शिक्षा : चिकित्सा (Medical)
- 🚩 संघ स्थापना : 1925
- 👤 प्रथम सरसंघचालक
- 🕊 महाप्रयाण : 21 जून 1940
बाल्यकाल एवं प्रारम्भिक जीवन
बाल्यकाल से ही डॉ. हेडगेवार के मन में राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल थी। अंग्रेज़ी शासन के प्रति उनका विरोध बचपन से ही स्पष्ट दिखाई देता था। विद्यालय में भी वे देशभक्ति से प्रेरित गतिविधियों में सक्रिय रहते थे तथा अन्य विद्यार्थियों को भी राष्ट्रप्रेम के लिए प्रेरित करते थे।
शिक्षा एवं राष्ट्रवादी विचार
उन्होंने कोलकाता के राष्ट्रीय मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। अध्ययन काल में उनका सम्पर्क अनेक क्रांतिकारियों एवं राष्ट्रवादी विचारकों से हुआ, जिससे उनके व्यक्तित्व में संगठन, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के संस्कार और अधिक मजबूत हुए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना
विजयादशमी, वर्ष 1925 को उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उनका उद्देश्य ऐसा संगठित समाज तैयार करना था जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए सेवा, संस्कार और चरित्र निर्माण के माध्यम से भारत को सशक्त बनाए।
व्यक्तित्व एवं विरासत
डॉ. हेडगेवार का सम्पूर्ण जीवन अनुशासन, सादगी, संगठन क्षमता और राष्ट्र समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। उनके द्वारा स्थापित संगठन आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक माना जाता है और लाखों स्वयंसेवकों को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करता है।
डॉ. हेडगेवार के प्रमुख योगदान एवं उपलब्धियाँ
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित रहा। उन्होंने केवल एक संगठन की स्थापना ही नहीं की, बल्कि एक ऐसी विचारधारा का निर्माण किया जिसने लाखों स्वयंसेवकों को राष्ट्र सेवा, अनुशासन एवं चरित्र निर्माण के मार्ग पर प्रेरित किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना
विजयादशमी 1925 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर उन्होंने संगठित एवं चरित्रवान समाज निर्माण की दिशा में ऐतिहासिक कार्य किया। उनका उद्देश्य राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाले स्वयंसेवकों का निर्माण करना था।
संगठन निर्माण
उन्होंने समाज को जाति, भाषा, क्षेत्र एवं अन्य भेदों से ऊपर उठाकर एक संगठित राष्ट्र की भावना विकसित करने का कार्य किया। शाखा पद्धति के माध्यम से अनुशासन एवं नेतृत्व क्षमता का विकास किया।
चरित्र निर्माण
डॉ. हेडगेवार का विश्वास था कि राष्ट्र का भविष्य चरित्रवान नागरिकों पर निर्भर करता है। उन्होंने युवाओं में अनुशासन, सेवा, नेतृत्व एवं राष्ट्रभक्ति के संस्कार विकसित करने पर विशेष बल दिया।
स्वतंत्रता चेतना
वे स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय भावना से प्रेरित थे। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए संगठित, जागरूक एवं राष्ट्रनिष्ठ समाज की आवश्यकता है।
राष्ट्र प्रथम का संदेश
उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि व्यक्तिगत हितों से ऊपर राष्ट्रहित होना चाहिए। उनके विचार आज भी लाखों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
अमर विरासत
उनके द्वारा स्थापित संगठन आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में गिना जाता है। उनका जीवन, त्याग और संगठन निर्माण की प्रेरणा आज भी समाज के लिए पथप्रदर्शक है।
डॉ. हेडगेवार का संदेश
"राष्ट्र की शक्ति किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि संगठित, संस्कारित एवं चरित्रवान समाज में निहित होती है। जब समाज संगठित होता है, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है और विश्व में अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करता है।"
डॉ. हेडगेवार के मूल सिद्धांत
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का विश्वास था कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके संगठित, संस्कारित एवं चरित्रवान समाज में निहित होती है। उनके जीवन के सिद्धांत आज भी लाखों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
राष्ट्र सर्वोपरि
डॉ. हेडगेवार के लिए राष्ट्रहित सबसे ऊपर था। उनका मानना था कि व्यक्ति, समाज और संगठन का प्रत्येक कार्य राष्ट्र की उन्नति एवं अखंडता के लिए होना चाहिए।
संगठन की शक्ति
उन्होंने समाज को संगठित करने पर विशेष बल दिया। उनका विश्वास था कि संगठित समाज किसी भी चुनौती का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है।
चरित्र निर्माण
उन्होंने ऐसे नागरिकों का निर्माण करने पर बल दिया जो अनुशासित, निस्वार्थ, ईमानदार तथा राष्ट्रभक्त हों और समाज के लिए प्रेरणा बन सकें।
सेवा भाव
समाज की निःस्वार्थ सेवा को उन्होंने राष्ट्र निर्माण का आधार माना। सेवा, सहयोग और समर्पण उनके जीवन के प्रमुख आदर्श थे।
संस्कार एवं शिक्षा
उन्होंने युवाओं में नैतिक मूल्यों, अनुशासन और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान विकसित करने पर विशेष बल दिया।
एकात्मता
जाति, भाषा, प्रांत एवं अन्य सभी भेदों से ऊपर उठकर सम्पूर्ण समाज को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा उनके विचारों का मूल आधार थी।
प्रेरणादायक संदेश
"व्यक्ति का गौरव उसके पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण से होता है।"
परम पूजनीय श्री गुरुजी
(माधव सदाशिव गोलवलकर)
परम पूजनीय श्री गुरुजी, जिनका पूरा नाम माधव सदाशिव गोलवलकर था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक थे। उन्होंने वर्ष 1940 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के पश्चात संगठन का नेतृत्व संभाला और लगभग 33 वर्षों तक अपने दूरदर्शी नेतृत्व, आध्यात्मिक चिंतन एवं संगठन कौशल से संघ को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया।
श्री गुरुजी
द्वितीय सरसंघचालक
- 📅 जन्म : 19 फ़रवरी 1906
- 📍 जन्म स्थान : रामटेक (महाराष्ट्र)
- 🎓 शिक्षा : विज्ञान (M.Sc.), विधि अध्ययन
- 🚩 सरसंघचालक : 1940 – 1973
- 🌍 कार्यकाल : लगभग 33 वर्ष
- 🕊 महाप्रयाण : 5 जून 1973
प्रारम्भिक जीवन
19 फ़रवरी 1906 को जन्मे माधव सदाशिव गोलवलकर बचपन से ही अत्यंत मेधावी, अनुशासित तथा अध्ययनशील थे। उनके माता-पिता ने उनमें भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रप्रेम के संस्कार विकसित किए। प्रारम्भिक शिक्षा के दौरान ही उनकी असाधारण स्मरण शक्ति, तर्कशक्ति और ज्ञान के प्रति गहरी रुचि स्पष्ट दिखाई देने लगी।
विद्यालय एवं महाविद्यालय जीवन में उन्होंने विज्ञान विषय का गहन अध्ययन किया। अध्ययन के साथ-साथ भारतीय दर्शन, अध्यात्म, इतिहास तथा संस्कृति का भी गंभीर अध्ययन किया, जिसने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को व्यापक वैचारिक आधार प्रदान किया।
शिक्षा एवं व्यक्तित्व
उन्होंने विज्ञान विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया। अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व, सरल स्वभाव तथा ज्ञान के कारण विद्यार्थियों के बीच वे अत्यंत लोकप्रिय थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान विद्यार्थियों ने उन्हें सम्मानपूर्वक "गुरुजी" कहना प्रारम्भ किया और यही संबोधन आगे चलकर पूरे राष्ट्र में प्रसिद्ध हो गया।
उनका व्यक्तित्व केवल एक शिक्षक का नहीं था, बल्कि वे एक विचारक, आध्यात्मिक साधक, कुशल संगठनकर्ता और प्रेरक वक्ता भी थे। भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी गहरी आस्था और राष्ट्र के प्रति समर्पण ने उन्हें समाज जीवन में विशिष्ट स्थान दिलाया।
1906
जन्म वर्ष
M.Sc.
उच्च शिक्षा
1940
द्वितीय सरसंघचालक
33 वर्ष
नेतृत्व काल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान उनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों से हुआ। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के व्यक्तित्व, संगठन निर्माण की कार्यशैली तथा राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण ने श्री गुरुजी को अत्यंत प्रभावित किया। धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को संघ कार्य के लिए समर्पित कर दिया।
डॉ. हेडगेवार ने उनके व्यक्तित्व, नेतृत्व क्षमता एवं वैचारिक स्पष्टता को पहचानते हुए उन्हें संघ के विभिन्न उत्तरदायित्व सौंपे। वे शीघ्र ही संगठन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में सम्मिलित हो गए और पूरे देश में प्रवास कर स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन करने लगे।
द्वितीय सरसंघचालक के रूप में दायित्व
वर्ष 1940 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के महाप्रयाण के पश्चात श्री गुरुजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का द्वितीय सरसंघचालक नियुक्त किया गया। उस समय संघ का कार्य सीमित क्षेत्रों तक था, किन्तु उनके नेतृत्व में संघ का विस्तार देश के लगभग प्रत्येक प्रांत तक हुआ।
उन्होंने शाखा व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ बनाया, प्रशिक्षण वर्गों का विस्तार किया तथा राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा, शिक्षा, सामाजिक संगठन एवं सांस्कृतिक जागरण के अनेक कार्यों को गति प्रदान की।
नेतृत्व शैली एवं कार्यपद्धति
श्री गुरुजी का नेतृत्व अत्यंत सरल, आत्मीय एवं प्रेरणादायी था। वे प्रत्येक स्वयंसेवक के साथ व्यक्तिगत संवाद स्थापित करने में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि संगठन की शक्ति व्यक्ति निर्माण से आती है और व्यक्ति निर्माण संस्कार, अनुशासन एवं नियमित अभ्यास से होता है।
उन्होंने हजारों प्रवास किए, लाखों स्वयंसेवकों से प्रत्यक्ष संवाद किया तथा संगठन के विस्तार के लिए अथक परिश्रम किया। उनके नेतृत्व में संघ ने सेवा, शिक्षा, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता तथा राष्ट्र जागरण के अनेक क्षेत्रों में अपनी सक्रिय भूमिका विकसित की।
प्रमुख उपलब्धियाँ
33 वर्ष
दीर्घ नेतृत्व
अखिल भारतीय
संघ विस्तार
50,000+
स्वयं लिखे पत्र
70+
देशव्यापी प्रवास
संगठन
वैचारिक सुदृढ़ीकरण
सेवा
समाज जीवन में विस्तार
श्री गुरुजी की विरासत
श्री गुरुजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को केवल एक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र जीवन के व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में विकसित किया। उनके मार्गदर्शन में अनेक सामाजिक, शैक्षिक, सेवा एवं राष्ट्रहित के कार्यों का विस्तार हुआ।
उनके विचार आज भी संगठन के लाखों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। संगठन, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति, सेवा और सांस्कृतिक चेतना के जिन मूल्यों को उन्होंने स्थापित किया, वे आज भी संघ कार्य की आधारशिला माने जाते हैं।
— परम पूजनीय श्री गुरुजी

