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एकात्मतास्तोत्रम्

🕉 सनातन ज्ञान • राष्ट्रीय एकात्मता • भारतीय संस्कृति

एकात्मतास्तोत्रम्

एकात्मतास्तोत्रम् भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय चेतना का प्रेरणादायक स्तोत्र है। इसमें भारत की पवित्र नदियों, पर्वतों, तीर्थों, महापुरुषों, संतों, ऋषियों, वैज्ञानिकों, समाज सुधारकों तथा राष्ट्रीय विभूतियों का स्मरण कर सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रति एकात्मता, श्रद्धा और कर्तव्यबोध का संदेश दिया गया है। यह स्तोत्र भारतीय संस्कृति की विविधता में एकता का अद्भुत दर्शन कराता है।

📚 इस अध्ययन में क्या मिलेगा?

📜

सम्पूर्ण स्तोत्र

एकात्मतास्तोत्रम् के सभी श्लोक क्रमवार एवं सुव्यवस्थित रूप में।

📝

हिन्दी अर्थ

प्रत्येक श्लोक का सरल हिन्दी अर्थ एवं विस्तृत व्याख्या।

🇮🇳

भारत दर्शन

पर्वत, नदियाँ, तीर्थ, महापुरुष, ग्रंथ एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत का परिचय।

🕉
33 श्लोक

सम्पूर्ण एकात्मतास्तोत्रम् का व्यवस्थित अध्ययन।

📚
हिन्दी अर्थ

सरल भाषा में भावार्थ एवं जीवन संदेश।

🌏
भारत दर्शन

भारतीय संस्कृति, तीर्थ, नदियाँ एवं महान विभूतियाँ।

🚩
राष्ट्रीय एकात्मता

एक राष्ट्र, एक संस्कृति एवं एकात्म भाव का प्रेरक संदेश।

📖 परिचय एवं अध्ययन

एकात्मतास्तोत्रम् क्या है?

एकात्मतास्तोत्रम् भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय एकता का प्रेरणादायक स्तोत्र है। इसमें भारत के पर्वतों, नदियों, तीर्थस्थलों, ग्रंथों, ऋषियों, संतों, वैज्ञानिकों, वीरों तथा महान विभूतियों का स्मरण कर राष्ट्र के प्रति श्रद्धा, कर्तव्य और एकात्म भाव जागृत करने का संदेश दिया गया है।

🕉 एकात्मतास्तोत्रम् का उद्देश्य

एकात्मतास्तोत्रम् का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण भारत को एक सांस्कृतिक परिवार के रूप में देखने की भावना विकसित करना है। यह स्तोत्र हमें यह स्मरण कराता है कि विविध भाषाएँ, परम्पराएँ, प्रदेश, तीर्थ, नदियाँ और महापुरुष मिलकर भारत की महान सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करते हैं।

इस स्तोत्र के नियमित अध्ययन एवं पाठ से राष्ट्र के प्रति श्रद्धा, पूर्वजों के प्रति सम्मान, भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रति आस्था तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है। इसलिए इसे केवल एक धार्मिक स्तोत्र न मानकर भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का प्रेरक ग्रंथ माना जाता है।

🌟 अध्ययन का उद्देश्य यह पृष्ठ एकात्मतास्तोत्रम् के प्रत्येक श्लोक, उसके सरल हिन्दी अर्थ, जीवन संदेश तथा सांस्कृतिक महत्व को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करता है ताकि विद्यार्थी, शिक्षक, शोधकर्ता एवं सामान्य पाठक सभी इसका लाभ उठा सकें।

📚 इस पृष्ठ में क्या मिलेगा?

  • सम्पूर्ण एकात्मतास्तोत्रम्
  • प्रत्येक श्लोक का हिन्दी अर्थ
  • सरल एवं विस्तृत व्याख्या
  • भारत दर्शन (नदी, पर्वत, तीर्थ)
  • महापुरुष एवं संत परिचय
  • एकात्मता मंत्र
  • जीवन संदेश एवं अध्ययन सामग्री

🎯 यह सामग्री किनके लिए उपयोगी है?

  • विद्यालय एवं महाविद्यालय के विद्यार्थी
  • प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी
  • शिक्षक एवं शोधार्थी
  • संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति के विद्यार्थी
  • स्वयंसेवक एवं सामाजिक कार्यकर्ता

🌸 एकात्मतास्तोत्रम् की प्रमुख विशेषताएँ

🇮🇳

राष्ट्रीय एकता

विविधता में एकता और सम्पूर्ण भारत के प्रति आत्मीयता का संदेश।

📜

भारतीय ज्ञान

वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत एवं अन्य ग्रंथों का सम्मान।

🏔️

भारत दर्शन

पर्वत, नदियाँ, तीर्थ और ऐतिहासिक नगरों का स्मरण।

🌟

चरित्र निर्माण

महापुरुषों के आदर्शों से प्रेरणा लेकर श्रेष्ठ जीवन का निर्माण।

🌟 सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व

एकात्मतास्तोत्रम् का महत्व

एकात्मतास्तोत्रम् केवल श्लोकों का संग्रह नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और आध्यात्मिक दृष्टि का प्रेरणादायक घोष है। यह हमें अपने इतिहास, संस्कृति, पूर्वजों और राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने की प्रेरणा देता है।

🇮🇳

राष्ट्रीय एकात्मता

यह स्तोत्र सम्पूर्ण भारत को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है। विभिन्न प्रदेश, भाषाएँ, परम्पराएँ और संस्कृतियाँ मिलकर भारत की अखण्ड पहचान बनाती हैं।

🕉️

आध्यात्मिक दृष्टि

इसमें परमात्मा, प्रकृति और सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति मंगलभाव प्रकट किया गया है। यह मानव और प्रकृति के बीच संतुलन तथा सार्वभौमिक कल्याण का संदेश देता है।

📚

भारतीय ज्ञान परम्परा

वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता, पुराण तथा अनेक संतों और महापुरुषों का स्मरण भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रति श्रद्धा जागृत करता है।

🏔️

भारत दर्शन

इस स्तोत्र में पर्वत, नदियाँ, तीर्थ, नगर और ऐतिहासिक स्थलों का उल्लेख भारत की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विविधता का परिचय कराता है।

🌱

चरित्र निर्माण

महापुरुषों, संतों, वीरों और समाज सुधारकों के आदर्शों से प्रेरणा लेकर सत्य, सेवा, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा का विकास होता है।

🤝

समरस समाज

एकात्मता का भाव व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के बीच विश्वास, सहयोग और समरसता को मजबूत बनाता है।

🌼 एकात्मता की यात्रा

👤

व्यक्ति

स्वयं का विकास

👨‍👩‍👧‍👦

परिवार

संस्कार एवं सहयोग

🤝

समाज

समरसता एवं सेवा

🇮🇳

राष्ट्र

एकता एवं कर्तव्य

🌍

विश्व

वसुधैव कुटुम्बकम्

📜 एकात्मतास्तोत्रम् का मूल संदेश

जब हम भारत की नदियों, पर्वतों, तीर्थों, महापुरुषों, संतों, वैज्ञानिकों और सांस्कृतिक विरासत को समान श्रद्धा से स्मरण करते हैं, तब हमारे भीतर राष्ट्र के प्रति एकात्मता, कर्तव्य, सेवा और समर्पण की भावना विकसित होती है। यही इस स्तोत्र का केंद्रीय संदेश है।

📜 एकात्मतास्तोत्रम् अध्ययन

श्लोक 1 से अध्ययन प्रारम्भ

एकात्मतास्तोत्रम् का प्रथम श्लोक सम्पूर्ण विश्व के मंगलस्वरूप, सच्चिदानन्द परमात्मा की वंदना से आरम्भ होता है। भारतीय परम्परा में प्रत्येक शुभ कार्य ईश्वर स्मरण से प्रारम्भ करने की परम्परा रही है।

🕉 श्लोक – 1

संस्कृत मूल पाठ
ॐ सच्चिदानन्दरूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ।

ज्योतिर्मयस्वरूपाय विश्वमाङ्गल्यमूर्तये ॥१॥

📝 सरल हिन्दी अर्थ

सच्चिदानन्द स्वरूप, समस्त विश्व का कल्याण करने वाले, प्रकाशमय तथा परम मंगलमय परमात्मा को हमारा नमस्कार है। वही सम्पूर्ण सृष्टि के आधार हैं तथा समस्त प्राणियों के जीवन में प्रकाश, शान्ति और कल्याण का स्रोत हैं।

📖 विस्तृत व्याख्या

एकात्मतास्तोत्रम् का प्रारम्भ ईश्वर की वंदना से होता है। यहाँ परमात्मा को केवल किसी एक सम्प्रदाय के देवता के रूप में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याणकारी, ज्ञानस्वरूप और आनन्दस्वरूप परम तत्व के रूप में स्मरण किया गया है। यह भारतीय दर्शन की उस भावना को व्यक्त करता है जिसमें सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की कामना की जाती है।

🌟 इस श्लोक से मिलने वाली सीख

  • हर शुभ कार्य की शुरुआत ईश्वर स्मरण से करनी चाहिए।
  • विश्व कल्याण की भावना भारतीय संस्कृति का मूल आधार है।
  • जीवन में ज्ञान, प्रकाश और सत्य का अनुसरण करना चाहिए।
  • सभी प्राणियों के प्रति मंगलभाव रखना ही सच्ची आध्यात्मिकता है।

📜 श्लोक – 2

🕉 संस्कृत मूल पाठ

प्रकृतिः पञ्चभूतानि ग्रहा लोका स्वरास्तथा ।

दिशः कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वन्तु मङ्गलम् ॥२॥

📝 सरल हिन्दी अर्थ

सत्त्व, रज और तमोगुण से युक्त प्रकृति, पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), सभी ग्रह, समस्त लोक, सातों स्वर, दसों दिशाएँ तथा भूत, वर्तमान और भविष्य—ये सभी हमारे तथा सम्पूर्ण विश्व के लिए सदैव मंगलकारी और कल्याणकारी हों।

🌿 श्लोक – 2 की व्याख्या

📖 विस्तृत व्याख्या

इस श्लोक में सम्पूर्ण सृष्टि के मंगल की कामना की गई है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति माना गया है। इसलिए एकात्मतास्तोत्रम् के प्रारम्भिक श्लोकों में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जैसे पंचमहाभूतों का स्मरण किया गया है। ये पाँचों तत्व सम्पूर्ण जीवन के आधार हैं और इनके बिना किसी भी जीव का अस्तित्व सम्भव नहीं है।

श्लोक में ग्रहों, लोकों, दिशाओं, स्वरों तथा काल का भी उल्लेख किया गया है। इसका तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। मानव, प्रकृति और ब्रह्माण्ड का संबंध परस्पर सहयोग और संतुलन पर आधारित है। जब यह संतुलन बना रहता है, तभी व्यक्ति, समाज और विश्व का कल्याण सम्भव होता है।

भारतीय दर्शन हमें सिखाता है कि केवल अपने परिवार या समाज के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए मंगल की कामना करनी चाहिए। यही भावना आगे चलकर "वसुधैव कुटुम्बकम्" के आदर्श को साकार करती है।

🌎 इस श्लोक में उल्लिखित प्रमुख तत्व

  • प्रकृति – सम्पूर्ण सृष्टि की मूल शक्ति।
  • पंचमहाभूत – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश।
  • ग्रह एवं लोक – ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और संतुलन के प्रतीक।
  • दिशाएँ – जीवन के प्रत्येक मार्ग में शुभता का संकेत।
  • काल – भूत, वर्तमान और भविष्य का निरंतर प्रवाह।

🌟 जीवन संदेश

  • प्रकृति का संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक दायित्व है।
  • मनुष्य स्वयं को सम्पूर्ण सृष्टि से अलग न समझे।
  • विश्व के कल्याण की भावना ही भारतीय संस्कृति का मूल आदर्श है।
  • पर्यावरण, जल, वन और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करना चाहिए।
  • जीवन में संतुलन, समरसता और सहयोग का भाव विकसित करना चाहिए।

🎓 विद्यार्थियों के लिए अध्ययन बिंदु

इस श्लोक से विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि विज्ञान, पर्यावरण और भारतीय दर्शन परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति के प्रति सम्मान, पर्यावरण संरक्षण तथा वैश्विक कल्याण की भावना विकसित करना ही इस श्लोक का व्यावहारिक संदेश है।

💡 मुख्य निष्कर्ष

यह श्लोक हमें सिखाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। जब प्रकृति, समाज और मानव के बीच संतुलन बना रहता है, तभी वास्तविक शांति, समृद्धि और विश्वकल्याण संभव होता है।

📜 एकात्मतास्तोत्रम् अध्ययन • भाग 2

श्लोक 6–10

एकात्मतास्तोत्रम् के इस भाग में भारत की पवित्र नगरियों, प्राचीन ज्ञान परम्परा, वेद-पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता तथा महान मातृशक्तियों का स्मरण किया गया है। यह भाग भारत की सांस्कृतिक निरन्तरता, आध्यात्मिक विरासत और राष्ट्रीय चेतना को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है।

🌸 इस भाग में क्या अध्ययन करेंगे?

श्लोक 6 से 10 तक भारत की पवित्र तीर्थनगरी, ऐतिहासिक नगर, भारतीय ज्ञान परम्परा के महान ग्रन्थ तथा आदर्श नारी चरित्रों का उल्लेख मिलता है। इन श्लोकों का उद्देश्य केवल नामों का स्मरण कराना नहीं, बल्कि उनके पीछे निहित सांस्कृतिक, नैतिक और राष्ट्रीय मूल्यों को समझाना भी है।

इन श्लोकों के अध्ययन से हमें यह अनुभव होता है कि भारत की शक्ति केवल उसके भौगोलिक विस्तार में नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध ज्ञान परम्परा, आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और महान व्यक्तित्वों में निहित है।

🏛️

पवित्र नगर

अयोध्या, काशी, मथुरा, द्वारिका आदि का महत्व।

📚

ज्ञान परम्परा

वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत और गीता।

🌺

आदर्श नारियाँ

सीता, सावित्री, गार्गी, मीरा और अन्य प्रेरक व्यक्तित्व।

🇮🇳

राष्ट्रीय संस्कृति

भारत की अखण्ड सांस्कृतिक चेतना का परिचय।

एकात्मतास्तोत्रम्

                                                                     एकात्मतास्तोत्रम्

(देश के प्रति अनन्य भक्ति, पूर्वजो के प्रति अगाध श्रद्धा तथा सम्पूर्ण देश में निवास करने वाले बन्धु-बान्धवों के प्रति एकात्मता का बोध कराने वाले इन मंत्रों का नित्य प्रति पाठ करना चाहिए।)

ॐ सच्चिदानन्दरूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ।

ज्योतिर्मयस्वरूपाय विश्वमाङ्गल्यमूर्तये । । 1 । ।

विश्वकल्याण के प्रतिमूर्ति, ज्योतिर्मय, सच्चिदानन्द स्वरूप

परमात्मा को नमस्कार ।।1।।

प्रकृतिः पञ्च भूतानि ग्रहा लोका स्वरास्तथा ।

दिशः कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वन्तु मङ्गलम् । 12 ।।

सत्व, रज और तमोगुण से युक्त प्रकृति; पंचभूत (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश); नवग्रह; तीनों लोक; सात स्वर; दसों दिशाएं तथा सभी काल (भूत, भविष्य, वर्तमान) सर्वदा कल्याणकारी हों ||2||

रत्नाकराधौतपदां हिमालयकिरीटिनीम् ।

ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्यां वन्दे भारतमातरम् || 3 ||

सागर जिसके चरण धो रहा है, हिमालय जिसका मुकुट है। और जो ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि रूपी रत्नों से समृद्ध है, ऐसी भारतमाता की मैं वन्दना करता हूँ || 3 ||

महेन्द्रो मलयः सहयो, देवतात्मा हिमालयः ।

ध्येयो रैवतको विन्ध्यो, गिरिश्चारावलिस्तथा ।। 4।।

महेन्द्र (उड़ीसा में), मलयगिरि (मैसूर में), सहयाद्रि (पश्चिमी घाट), देवतात्मा हिमालय, रैवतक (काठियावाड़ में गिरनार), विन्ध्याचल, तथा अरावली (राजस्थान) पर्वत ध्यान करने योग्य हैं।। 4।।

गङ्गा सरस्वती सिन्धुर्ब्रह्मपुत्रश्च गण्डकी । कावेरी यमुना रेवा कृष्णा गोदा महानदी ॥ 5 ॥

गंगा, सरस्वती, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, गण्डकी, कावेरी, यमुना,

रेवा (नर्मदा), कृष्णा, गोदावरी तथा महानदी आदि प्रमुख नदियाँ ।। 5 ।। अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्चि अवन्तिका ।

वैशाली द्वारिका ध्येया पुरी तक्षशिला गया ।। 6 ।।

अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार). कांशी, कांचि. अवन्तिका (उज्जैन), द्वारिका, वैशाली, तक्षशिला, जगन्नाथपुरी गया तथा ।। 611

प्रयागः पाटलीपुत्रं विजयानगरं महत् । इन्द्रप्रस्थं सोमनाथः तथाऽमृतसरः प्रियम् ।। 7।।

प्रयाग, पाटलीपुत्र, विजय नगर, इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) विख्यात

सोमनाथ, अमृतसर ध्यान करने योग्य हैं ।। 7।। चतुर्वेदाः पुराणानि सर्वोपनिषदस्तथा । रामायणं भारतं च गीता सद्दर्शनानि च ।। 8 ।।

चारों वेद, 18 पुराण, सभी उपनिषद्, रामायण, महाभारत,

गीता तथा अन्य श्रेष्ठ दर्शन और ।। 8 ।।

जैनागमास्त्रिपिटका गुरुग्रन्थः सतां गिरः । एष ज्ञाननिधिः श्रेष्ठः श्रद्धेयो हृदि सर्वदा ॥ 9 ॥

जैनों के आगम ग्रन्थ, बौद्धों के त्रिपिटक (विनय पिटक, सुत्तपिटक, और अभिधम्म पिटक) तथा श्री गुरुग्रंथ की सत्य वाणी, हिन्दू समाज के श्रेष्ठ ज्ञानकोष हैं। इनके प्रति हृदय में सदा श्रद्धा बनी रहे ।। 9।।

अरुन्धत्यनसूया च सावित्री जानकी सती ।

द्रौपदी कण्णगी गार्गी मीरा दुर्गावती तथा ।। 10।। अरुन्धती, अनुसूया, सावित्री, सीता, सती. द्रौपदी, कण्णगी, गार्गी, मीरा दुर्गावती तथा ।। 10 ।।

लक्ष्मीरहल्या चेन्नम्मा रुद्रमाम्बा सुविक्रमा । निवेदिता सारदा च प्रणम्या मातृदेवताः ॥ 11 ॥

लक्ष्मीबाई, अहल्याबाई होलकर चन्नम्मा आदि पराक्रमी नारियाँ, भगिनी निवेदिता तथा सारदा (स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी) मातृस्वरूपा हैं, वन्दनीय हैं ।। 11 ।।

श्रीरामो भरतः कृष्णो भीष्मो धर्मस्तथार्जुनः ।

मार्कण्डेयो हरिशचन्द्रः प्रहलादो नारदो ध्रुवः ।। 12|| भगवान श्रीराम, भरत, कृष्ण, भीष्म, धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन, ऋषि मार्कण्डेय, हरिश्चन्द्र प्रह्लाद, नारद, ध्रुव तथा ।।12।।

हनुमान जनको व्यासो वशिष्ठश्च शुको बलिः ।

दधीचि विश्वकर्माणौ पृथुवाल्मीकिभार्गवाः ।। 13।। हनुमान, जनक, व्यास, वशिष्ठ, शुकदेव, राजा बलि, विश्वकर्मा, पृथ, वाल्मीकि, भार्गव (परशुराम ) ।। 13।।

दधीचि,

भगीरथश्चैकलव्यो मनुर्धन्वन्तरिस्तथा । शिबिश्च रन्तिदेवश्च पुराणोद्गीतकीर्तयः ॥ 14 ॥

भगीरथ, एकलव्य, मनु, धन्वन्तरि, शिबि तथा रन्तिदेव की कीर्ति पुराणों में गाई गई है ।। 14 ।।

बुद्धा जिनेन्द्रा गोरक्षः पाणिनिश्च पत०जलि । शंकरो मध्वनिम्बार्कौ श्रीरामानुजवल्लभौ ।। 1511

बुद्ध के सभी अवतार, सभी तीर्थकर, गुरु गोरखनाथ, पाणिनि, पंतजलि, शंकाराचार्य, मध्वार्चा, निम्बार्काचार्य, रामनुजाचार्य तथा बल्लभाचार्य, ।। 15।।

झुलेलालोऽथ चैतन्यः तिरुवल्लुवरस्तथा ।

नायन्मारालवाराश्च कंबश्च बसवेश्वरः ।। 16।।

झूलेलाल, महाप्रभु चैतन्य, तिरुवल्लुवर, नायन्मार तथा आलवार सन्तपरम्परा, कंब, बसवेश्वर तथा ।। 16।।

देवलो रविदासश्च कबीरो गुरुनानकः ।

नरसिस्तुलसीदासो दशमेशो दृढव्रतः ॥ 17 ॥ महर्षि देवल, सन्त रविदास, कबीर, गुरुनानक, नरसी तुलसीदास, दृढव्रती गुरुगोविन्दसिंह, ।। 17।। श्रीमत् शंकरदेवश्च बन्धू सायण – माधवौ ।

मेहता.

ज्ञानेश्वरस्तुकारामो रामदासः पुरन्दरः ।। 18 ।। आसाम के वैष्णव सन्त श्रीमत् शंकरदेव, सायणाचार्य, माधवाचार्य संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, समर्थगुरु रामदास, पुरन्दरदास ।। 18 ।।

बिरसा सहजानन्दो रामानन्दस्तथा महान् । वितरन्तु सदैवेते दैवीं सद्गुणसम्पदम् ।। 1911 बिरसामुण्डा, स्वामी सहजानन्द, रामानन्द आदि महान

पुरुष सदैव समाज को श्रेष्ठ गुण प्रदान करें ।। 1911 भरतर्षिः कालिदासः श्रीभोजो जकणस्तथा । सूरदासस्त्यागराजो रसखानश्च सत्कविः ।। 20।।

नाट्यशास्त्र के आदि गुरु भरत ऋषि, संस्कृत के विद्वान कालिदास, महाराजा भोज, जकण, महात्मा सूरदास, त्यागराज, रसखान जैसे श्रेष्ठ कवि तथा । । 20।।

रविवर्मा भातखण्डे भाग्यचन्द्रः स भूपतिः ।

कलावन्तश्च विख्याता स्मरणीया निरन्तरम् ।। 21।। महान चित्रकार रविवर्मा, वर्तमान संगीत कला के विख्यात उद्धारक भातखण्डे, मणिपुर के राजा भाग्यचन्द्र आदि विख्यात

कलाकार सर्वदा स्मरणीय हैं। ।। 21 । । अगस्त्यः कम्बुकौण्डिन्यौ राजेन्द्रश्चोलवंशजः ।

अशोकः पुष्यमित्रश्च खारवेलः सुनीतिमान्।। 22 ।।

अगस्त्य, कम्बु, कौण्डिन्य, चोलवंशज राजेन्द्र, अशोक, पुष्यमित्र तथा खारवेल नीतिज्ञ हैं ।। 22।।

चाणक्य-चन्द्रगुप्तौ च विक्रमः शालिवाहनः । समुद्रगुप्तः श्रीहर्षः शैलेन्द्रो बप्परावलः ।। 23।।

चाणक्य, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, शालिवाहन, समुद्रगुप्त, हर्षवर्धन, शैलेन्द्र, बप्पारावल तथा ।। 23 ।। लाचिद् भास्करवर्मा च यशोधर्मा च हूणजित् ।

श्रीकृष्णदेवरायश्च ललितादित्य उद्बलः ॥24 ॥ लाचिद् बड़फुंकन, भास्करवर्मा, हूणविजयी ‘यशोधर्मा, श्रीकृष्णदेवराय तथा ललितादित्य जैसे वलशाली ।। 24।।

मुसुनूरिनायकौ तौ प्रतापः शिवभूपतिः । रणजित्सिंह इत्येते वीरा विख्यातविक्रमाः ।। 25।।

प्रोलय नायक, कप्पयनायक, महाराणाप्रताप, महाराज शिवाजी तथा रणजीत सिंह, इस देश में ऐसे विख्यात पराक्रमी वीर हुए हैं। 25।।

वैज्ञानिकाश्च कपिलः कणादः सुश्रुतस्तथा ।

चरको भास्कराचार्यो वराहमिहिरः सुधीः ।। 2611 हमारे बुद्धिमान वैज्ञानिक कपिलमुनि, कणाद ऋषि सुश्रुत, चरक, भास्काराचार्य तथा वराहमिहिर ।। 26 ।।

नागार्जुनो भरद्वाज आर्यभट्टो बसुर्बुधः ।

ध्येयो वेङ्कटरामश्च विज्ञा रामानुजादयः ॥ 27

।।

नागार्जुन, भरद्वाज, आर्यभट्ट, जगदीशचन्द्र बसु, चन्द्रशेखर वेंकट रमन तथा राजमानुजम् जैसे प्रतिभावान वैज्ञानिक स्मरणीय

हैं । 27 ।।

रामकृष्णो दयानन्दो रवीन्द्रो राममोहनः । रामतीर्थोऽरविंदश्च विवेकानन्द उद्यशाः ।। 28 ।।

रामकृष्ण परमहंस, स्वामी दयानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर राजा राममोहनराय, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविन्द स्वामी विवेकानन्द

तथा ।। 28 ।।

दादाभाई गोपबन्धुः तिलको गान्धिरादृता । रमणो मालवीयश्च श्री सुब्रह्मण्यभारती ।। 29 ।। दादाभाई नौरोजी, गोपबंधु दास, महात्मा गाँधी बाल

गंगाधर तिलक, महर्षि रमण, महामना मालवीय तथा सुब्रह्मण्य भारती आदरणीय हैं ।। 29 ।।

सुभाषः प्रणवानन्दः क्रान्तिवीरो विनायकः । ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः ।। 3011

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, प्रणवानन्द, क्रान्तिवीर विनायक दामोदर सावरकर, ठक्कर बाप्पा, भीमराव अम्बेडकर, ज्योतिराव

फुले, नारायण गुरु तथा ।। 30 ।। संघशक्तिप्रणेतारौ केशवो माधवस्तथा ।

स्मरणीयाः सदैवैते नवचैतन्यदायकाः ॥ 31 ॥

संघ – शक्ति के प्रणेता प.पू केशवराव बलिराम हेडगेवार तथा माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, हिन्दू समाज में नवीन चेतना प्रदान करने वाले महापुरुष सदैव स्मरणीय हैं ।। 31।।

अनुक्ता ये भक्ताः प्रभुचरणसंसक्तहृदयाः

अनिर्दिष्टा वीरा अधिसमरमुद्ध्वस्तरिपवः ।

समाजोद्धर्तारः सुहितकरविज्ञाननिपुणाः

नमस्तेभ्यो भूयात् सकलसुजनेभ्यः प्रतिदिनम् ॥ 32 ॥

प्रभुचरण में अनुरक्त रहने वाले अनेक भक्त जो शेष रह गए. देश की अस्मिता और अखण्डता पर प्रहार करने वाले शत्रुओं को युद्ध में परास्त करने वाले बहुत से वीर जिनके नामों का उल्लेख नहीं हो पाया, तथा अन्य समाजोद्धारक, समाज के हितचिन्तक तथा निपुण वैज्ञानिक एवं सभी श्रेष्ठजनों को प्रतिदिन हमारे प्रणाम समर्पित हों ।। 32 ।।

इदमेकात्मतास्तोत्रं श्रद्धया यः सदा पठेत् । स राष्ट्रधर्मनिष्ठावान् अखण्डं भारतं स्मरेत् ।। 33 ।।

इस एकात्मता स्तोत्र का जो सदा श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा. राष्ट्रधर्म में निष्ठावान वह (व्यक्ति) अखण्ड भारत का स्मरण

करेगा ।। 33 ।।

।। भारत माता की जय ।।

❓ Frequently Asked Questions

एकात्मतास्तोत्रम् FAQ

एकात्मतास्तोत्रम् से संबंधित सामान्य प्रश्न एवं उनके उत्तर।

एकात्मतास्तोत्रम् क्या है?

एकात्मतास्तोत्रम् भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता तथा महान विभूतियों के स्मरण का प्रेरणादायक स्तोत्र है।

एकात्मतास्तोत्रम् का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भारत के प्रति श्रद्धा, समाज में एकात्मता तथा राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की भावना जागृत करना।

क्या इसका दैनिक पाठ किया जा सकता है?

हाँ। श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन इसका पाठ करने से राष्ट्रभाव, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक प्रेरणा विकसित होती है।

इसमें किन-किन विषयों का उल्लेख है?

भारत माता, पर्वत, नदियाँ, तीर्थ, वेद, उपनिषद, महापुरुष, संत, वैज्ञानिक, समाज सुधारक तथा एकात्मता मंत्र।

विद्यार्थियों के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

यह भारतीय इतिहास, संस्कृति, आदर्श व्यक्तित्वों तथा राष्ट्रीय मूल्यों को समझने में सहायक है।

🌺 निष्कर्ष

एकात्मतास्तोत्रम् केवल श्लोकों का संग्रह नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकात्मता, आध्यात्मिक परम्परा और राष्ट्रीय चेतना का जीवंत परिचय है। इसमें भारत की पवित्र नदियों, पर्वतों, तीर्थों, महान ग्रंथों, संतों, ऋषियों, वैज्ञानिकों और राष्ट्रनिर्माताओं का स्मरण कर प्रत्येक भारतीय के मन में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और उत्तरदायित्व की भावना जागृत की जाती है।

यदि इसका नियमित अध्ययन और मनन किया जाए, तो यह व्यक्ति के चरित्र निर्माण, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक जागरूकता तथा राष्ट्रभक्ति को सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

🕉 प्रेरक संदेश

"एकात्मता का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र को अपना परिवार मानकर सेवा, समर्पण और सद्भाव के साथ जीवन जीना है।"

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✍️ लेखक परिचय

स्वयंसेवक | संघ आयु : 23 वर्ष

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