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🏠 Home › राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ › संघ की शाखा
॥ संघे शक्ति कलौ युगे ॥

संघ की शाखा राष्ट्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास एवं संगठन का जीवंत प्रशिक्षण केन्द्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा केवल प्रतिदिन एक घंटे का कार्यक्रम नहीं, बल्कि अनुशासन, सेवा, नेतृत्व, शारीरिक क्षमता, बौद्धिक विकास, राष्ट्रभक्ति तथा चरित्र निर्माण की एक सशक्त जीवन पद्धति है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में शाखा का उद्देश्य, समय-सारिणी, कार्यक्रम, आज्ञाएँ, बौद्धिक एवं शारीरिक योजना तथा सम्पूर्ण कार्यप्रणाली को सरल एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है।

🏛

शाखा क्या है?

शाखा संघ की मूल कार्यपद्धति है जहाँ प्रतिदिन स्वयंसेवकों का नियमित, अनुशासित एवं संस्कारयुक्त प्रशिक्षण होता है।

🧭

मुख्य उद्देश्य

व्यक्तित्व निर्माण, संगठन, राष्ट्रसेवा, नेतृत्व क्षमता तथा समाज जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का निर्माण।

⚔

प्रमुख प्रशिक्षण

शारीरिक, बौद्धिक, खेल, योग, गीत, प्रार्थना, सेवा एवं अनुशासन आधारित दैनिक कार्यक्रम।

🟧

जीवन मूल्य

सेवा, समर्पण, आत्मीयता, समयपालन, राष्ट्रभक्ति एवं चरित्र निर्माण शाखा के प्रमुख आधार हैं।

विशेष : यह पृष्ठ संघ की शाखा से संबंधित विस्तृत एवं व्यवस्थित जानकारी प्रदान करता है। प्रत्येक अनुभाग को इस प्रकार तैयार किया गया है कि नए स्वयंसेवक, शिक्षक, कार्यकर्ता तथा सामान्य पाठक सभी शाखा की संपूर्ण कार्यप्रणाली को सरलता से समझ सकें।
संघ का मूल आधार

शाखा क्या है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति का सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रभावी माध्यम शाखा है। यह वह स्थान है जहाँ स्वयंसेवक प्रतिदिन एकत्र होकर शारीरिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करते हैं।

शाखा का वास्तविक स्वरूप

शाखा केवल व्यायाम, खेल अथवा परेड का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण, चरित्र निर्माण, अनुशासन, सेवा, संगठन और आत्मीयता का दैनिक प्रशिक्षण केन्द्र है।

प्रतिदिन निश्चित स्थान एवं निश्चित समय पर एकत्र होकर स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष विभिन्न कार्यक्रमों का अभ्यास करते हैं। यही नियमित अभ्यास व्यक्ति के जीवन में समयपालन, नेतृत्व, आत्मविश्वास, सहयोग तथा राष्ट्रभाव को विकसित करता है।

संघ की शाखा का उद्देश्य केवल एक घंटे का कार्यक्रम सम्पन्न करना नहीं, बल्कि स्वयंसेवक के सम्पूर्ण जीवन को राष्ट्रहित में समर्पित करने की प्रेरणा देना है।

परम पूजनीय श्री गुरुजी के शब्दों में

"संगठित जीवन के लिये आत्मीयतापूर्ण सम्बन्ध और अनुशासनबद्ध रूप में कार्य करने की सिद्धता आवश्यक है। प्रतिदिन निश्चित स्थान और निश्चित समय पर एकत्र होकर ध्वज के समक्ष कार्यक्रमों का अभ्यास करना, प्रार्थना करना तथा राष्ट्रकार्य की प्रेरणा लेकर अपने जीवन में उतरना ही शाखा का स्वरूप है।"

— परम पूजनीय श्री गुरुजी
🏛
संगठन

समाज को एक सूत्र में जोड़कर राष्ट्रहित के लिए कार्य करने की प्रेरणा।

🤝
आत्मीयता

जाति, भाषा, क्षेत्र और वर्ग से ऊपर उठकर भाईचारे एवं समरसता का विकास।

🟧
अनुशासन

नियमित अभ्यास, समयपालन, सेवा, नेतृत्व और जिम्मेदारी का संस्कार।

शाखा का उद्देश्य

संघ की शाखा के प्रमुख उद्देश्य एवं लाभ

संघ की शाखा का मूल उद्देश्य प्रत्येक स्वयंसेवक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है। यहाँ नियमित अभ्यास, अनुशासन, सेवा, नेतृत्व, संगठन तथा राष्ट्रभाव का ऐसा वातावरण तैयार किया जाता है जिससे व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के लिए भी उपयोगी बन सके।

🧑

व्यक्तित्व निर्माण

शाखा प्रत्येक स्वयंसेवक में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, समयपालन, अनुशासन तथा सकारात्मक जीवन दृष्टि का विकास करती है।

🤝

संगठन शक्ति

सामूहिक कार्य, परस्पर सहयोग, आत्मीयता तथा सामाजिक समरसता के माध्यम से समाज को संगठित करने की प्रेरणा दी जाती है।

🇮🇳

राष्ट्र सेवा

राष्ट्र सर्वोपरि की भावना विकसित करते हुए प्रत्येक स्वयंसेवक को समाज एवं देश के लिए समर्पित जीवन जीने का संस्कार प्रदान किया जाता है।

शाखा में नियमित आने से प्राप्त होने वाले प्रमुख लाभ

✓

अनुशासन एवं समयपालन

निश्चित समय पर नियमित उपस्थिति से जीवन में अनुशासन और समय के महत्व का विकास होता है।

✓

शारीरिक सुदृढ़ता

व्यायाम, सूर्य नमस्कार, खेल तथा योग के माध्यम से शरीर स्वस्थ, सक्रिय और ऊर्जावान बनता है।

✓

मानसिक एवं बौद्धिक विकास

कथा, चर्चा, गीत, सुभाषित एवं बौद्धिक कार्यक्रमों से विचारों में स्पष्टता तथा निर्णय क्षमता विकसित होती है।

✓

नेतृत्व क्षमता

शाखा के विभिन्न दायित्वों एवं कार्यक्रमों के माध्यम से नेतृत्व एवं प्रबंधन कौशल विकसित होता है।

✓

सेवा एवं सामाजिक उत्तरदायित्व

समाज के प्रति संवेदनशीलता, सेवा कार्यों में सहभागिता तथा राष्ट्रहित में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा मिलती है।

✓

आत्मविश्वास एवं चरित्र निर्माण

नियमित अभ्यास से साहस, आत्मबल, आत्मसंयम तथा उच्च नैतिक मूल्यों का विकास होता है।

"शाखा केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक श्रेष्ठ पद्धति है।"

जब व्यक्ति प्रतिदिन अनुशासन, सेवा, संगठन और राष्ट्रभक्ति का अभ्यास करता है, तब वही संस्कार उसके सम्पूर्ण जीवन का आधार बन जाते हैं। यही शाखा का वास्तविक उद्देश्य और उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

शाखा व्यवस्था

संघ की शाखाओं के प्रकार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचने के लिए विभिन्न प्रकार की शाखाओं का संचालन करता है। स्थान, समय, आयु वर्ग एवं स्थानीय आवश्यकता के अनुसार शाखाओं का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है, किन्तु सभी शाखाओं का उद्देश्य समान होता है—व्यक्तित्व निर्माण, संगठन एवं राष्ट्रसेवा।

🌅 प्रभात शाखा

प्रातःकाल आयोजित होने वाली शाखा को प्रभात शाखा कहा जाता है। इसमें सामान्यतः विद्यार्थी, नौकरीपेशा व्यक्ति तथा प्रातः जल्दी उठने वाले स्वयंसेवक सहभागी होते हैं।

  • समय – प्रातः
  • अवधि – लगभग 60 मिनट
  • योग, सूर्य नमस्कार एवं व्यायाम पर विशेष बल
  • दिनभर उत्साह एवं ऊर्जा का संचार
1

🌇 सायं शाखा

सायंकाल आयोजित होने वाली शाखा सबसे अधिक प्रचलित शाखा है। विद्यार्थी, व्यापारी, कर्मचारी तथा समाज के विभिन्न वर्गों के स्वयंसेवक इसमें भाग लेते हैं।

  • समय – सायंकाल
  • खेलों का समय अपेक्षाकृत अधिक
  • बौद्धिक एवं सामूहिक गतिविधियाँ
  • सभी आयु वर्ग के लिए उपयुक्त
2

📅 साप्ताहिक मिलन

जहाँ प्रतिदिन शाखा लगाना सम्भव नहीं होता वहाँ सप्ताह में एक दिन स्वयंसेवकों का नियमित मिलन आयोजित किया जाता है।

  • सप्ताह में एक बार
  • गीत, चर्चा एवं खेल
  • संगठन का निरंतर संपर्क
  • नई भर्ती के लिए उपयोगी
3

🤝 संघ मंडली

छोटे गाँवों अथवा ऐसे क्षेत्रों में जहाँ स्वयंसेवकों की संख्या कम हो, वहाँ संघ मंडली का आयोजन किया जाता है। यह भविष्य की नियमित शाखा का आधार बनती है।

  • छोटे समूह में बैठक
  • संपर्क एवं परिचय
  • बौद्धिक चर्चा
  • भविष्य में शाखा स्थापना का आधार
4

शाखा का स्वरूप भिन्न, उद्देश्य एक

चाहे शाखा प्रतिदिन लगे, सप्ताह में एक बार आयोजित हो अथवा संघ मंडली के रूप में संचालित हो—सभी का मूल उद्देश्य स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व का विकास, समाज का संगठन, राष्ट्रभक्ति की भावना का जागरण तथा सेवा, अनुशासन एवं समरसता के संस्कारों का निर्माण करना है।

दैनिक शाखा

शाखा की समय-सारिणी

शाखा का समय सामान्यतः एक घंटा निर्धारित होता है। इस एक घंटे में शारीरिक, बौद्धिक, खेल, प्रार्थना तथा अनुशासन से संबंधित सभी कार्यक्रम सुव्यवस्थित क्रम में सम्पन्न किए जाते हैं, जिससे प्रत्येक स्वयंसेवक का संतुलित एवं सर्वांगीण विकास हो सके।

कार्यक्रम
समय
अवधि
शाखा लगाना एवं उष्ण व्यायाम
प्रारम्भ
5 मिनट
अनिवार्य शारीरिक कार्यक्रम (सूर्य नमस्कार, दण्ड, समता)
दैनिक
15 मिनट
खेल
दैनिक
15 मिनट
वैकल्पिक शारीरिक कार्यक्रम / व्यायाम योग
आवश्यकतानुसार
10 मिनट
बौद्धिक कार्यक्रम / गीत / सुभाषित / अमृतवचन
सप्ताह में 4-5 दिन
10 मिनट
प्रार्थना एवं शाखा समापन
अंतिम चरण
5 मिनट

🌅 प्रातः शाखा

प्रातःकालीन शाखा सामान्यतः 60 मिनट की होती है। इसमें सूर्य नमस्कार, व्यायाम, खेल, बौद्धिक कार्यक्रम तथा प्रार्थना निर्धारित समयानुसार सम्पन्न किए जाते हैं।

🌇 सायं शाखा

सायंकालीन शाखा में खेलों का समय अपेक्षाकृत अधिक होता है। स्थानीय परिस्थिति के अनुसार इसकी अवधि लगभग 60 से 90 मिनट तक हो सकती है।

समय का अनुशासन ही शाखा की विशेषता है

शाखा का प्रत्येक कार्यक्रम निश्चित समय पर प्रारम्भ और समाप्त होता है। यही नियमितता स्वयंसेवकों में समयपालन, अनुशासन, कार्यकुशलता तथा संगठनात्मक जीवन के संस्कार विकसित करती है। शाखा का प्रत्येक मिनट व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

दैनिक शाखा कार्यक्रम

नित्य अनिवार्य कार्यक्रम

दैनिक शाखा में कुछ ऐसे कार्यक्रम निर्धारित हैं जिन्हें नियमित रूप से कराया जाना अपेक्षित है। ये कार्यक्रम प्रत्येक स्वयंसेवक के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विकास का आधार माने जाते हैं।

☀️

समंत्र तेरह सूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार शरीर, मन और आत्मा के संतुलित विकास का श्रेष्ठ अभ्यास है। इससे स्वास्थ्य, एकाग्रता, ऊर्जा तथा अनुशासन का विकास होता है।

प्रतिदिन
💪

25 दण्ड प्रहार

दण्ड अभ्यास से शरीर की शक्ति, संतुलन, साहस, आत्मविश्वास एवं कार्यक्षमता का विकास होता है। यह शाखा के प्रमुख शारीरिक अभ्यासों में से एक है।

प्रतिदिन
🚩

समता एवं संचलन

समता एवं संचलन के माध्यम से अनुशासन, सामूहिकता, आदेश पालन तथा संगठनात्मक कार्यशैली का व्यावहारिक अभ्यास कराया जाता है।

प्रतिदिन
🎵

संघ गीत

संघ गीत स्वयंसेवकों में राष्ट्रभक्ति, प्रेरणा एवं सामूहिक भाव जागृत करते हैं। प्रत्येक माह कम से कम एक गीत कंठस्थ करने का प्रयास किया जाता है।

नियमित
📜

सुभाषित

संस्कृत अथवा भारतीय भाषाओं के प्रेरणादायक सुभाषितों के माध्यम से नैतिक मूल्य, जीवन-दर्शन एवं संस्कारों का विकास किया जाता है।

15 दिन
🕉️

अमृतवचन

महापुरुषों के प्रेरणादायक विचार एवं अमर वचन स्वयंसेवकों में राष्ट्रभाव, सेवा, त्याग तथा चरित्र निर्माण की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

15 दिन

नियमित अभ्यास का महत्व

इन सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल शारीरिक अभ्यास कराना नहीं है, बल्कि स्वयंसेवकों के भीतर अनुशासन, आत्मविश्वास, संगठन शक्ति, राष्ट्रभक्ति, सेवा भावना तथा उत्तम चरित्र का विकास करना है। दैनिक अभ्यास से इन गुणों का स्थायी संस्कार निर्मित होता है, जो शाखा की कार्यपद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है।

शाखा का वैकल्पिक प्रशिक्षण

वैकल्पिक कार्यक्रम

स्वयंसेवकों की आयु, अनुभव, शारीरिक क्षमता एवं स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शाखा में कुछ वैकल्पिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इनका उद्देश्य प्रत्येक आयु वर्ग के स्वयंसेवकों का संतुलित एवं प्रभावी विकास करना है।

👦

बाल एवं शिशु शाखा

बाल एवं शिशु स्वयंसेवकों के लिए कार्यक्रम सरल, मनोरंजक एवं संस्कारप्रधान बनाए जाते हैं ताकि खेल-खेल में उनका शारीरिक एवं मानसिक विकास हो सके।

  • योगासन
  • योगचाप
  • पदविन्यास
  • दण्ड का प्रारम्भिक अभ्यास
  • रचनात्मक एवं मनोरंजक खेल
  • रुमाल, पताका एवं अन्य साधनों से योग
🧑

तरुण एवं प्रौढ़ शाखा

तरुण एवं प्रौढ़ स्वयंसेवकों के लिए साहस, नेतृत्व, आत्मविश्वास तथा शारीरिक क्षमता को विकसित करने वाले कार्यक्रमों का अभ्यास कराया जाता है।

  • दण्ड युद्ध
  • नियुद्ध अभ्यास
  • पदविन्यास
  • योगासन एवं प्राणायाम
  • संधि व्यायाम
  • आवर्तन ध्यान
  • दण्ड संचालन

वैकल्पिक कार्यक्रमों का उद्देश्य

इन कार्यक्रमों का चयन शाखा की स्थानीय आवश्यकता, स्वयंसेवकों की आयु, संख्या एवं अभ्यास स्तर को ध्यान में रखकर किया जाता है। सामान्यतः किसी एक कार्यक्रम का अभ्यास तीन से चार माह तक सप्ताह में दो या तीन दिन नियमित रूप से कराया जाता है, जिससे स्वयंसेवकों में दक्षता, आत्मविश्वास एवं शारीरिक क्षमता का निरंतर विकास हो सके।

शाखा के प्रमुख कार्यक्रम

खेल • व्यायाम योग • बौद्धिक कार्यक्रम

शाखा का प्रत्येक कार्यक्रम स्वयंसेवकों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखकर बनाया गया है। खेल शरीर को सशक्त बनाते हैं, व्यायाम योग स्वास्थ्य एवं अनुशासन विकसित करता है तथा बौद्धिक कार्यक्रम विचारों को राष्ट्रहित की दिशा प्रदान करते हैं।

🏃

खेल

खेल शाखा का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। इसके माध्यम से साहस, नेतृत्व, सामूहिकता, आत्मविश्वास तथा विजयी मानसिकता का विकास होता है।

  • कबड्डी
  • खो-खो
  • आट्या-पाट्या
  • दौड़ एवं उछलकूद वाले खेल
  • समूह आधारित खेल
  • सप्ताह में कम से कम दो बार खेल
🧘

व्यायाम योग

व्यायाम योग का उद्देश्य शरीर को स्वस्थ, लचीला, संतुलित तथा ऊर्जावान बनाना है। प्रत्येक आयु वर्ग के अनुसार अभ्यास निर्धारित किए जाते हैं।

  • योगासन
  • सूर्य नमस्कार
  • प्राणायाम
  • संधि व्यायाम
  • आवर्तन ध्यान
  • दण्ड अभ्यास
📚

बौद्धिक कार्यक्रम

बौद्धिक कार्यक्रम स्वयंसेवकों में राष्ट्रबोध, सामाजिक जागरूकता, विचार शक्ति एवं भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव का विकास करते हैं।

  • कथा एवं प्रेरक प्रसंग
  • प्रश्नोत्तरी
  • समाचार समीक्षा
  • गीत एवं सुभाषित
  • अमृतवचन
  • बौद्धिक वर्ग एवं चर्चा

15+

विभिन्न प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक विकास हेतु गतिविधियाँ

360°

व्यक्तित्व निर्माण की समग्र प्रशिक्षण प्रणाली

100%

राष्ट्रभक्ति, अनुशासन एवं सेवा भावना पर आधारित संस्कार

"शाखा का प्रत्येक कार्यक्रम जीवन निर्माण की एक सीढ़ी है।"

खेल शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं, व्यायाम स्वास्थ्य एवं संतुलन विकसित करता है, जबकि बौद्धिक कार्यक्रम विचारों को दिशा देते हैं। इन तीनों का समन्वय ही शाखा को एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण केन्द्र बनाता है।

दैनिक शाखा प्रक्रिया

एक घंटे की शाखा का सम्पूर्ण कार्यक्रम

दैनिक शाखा का प्रत्येक चरण सुव्यवस्थित एवं समयबद्ध होता है। प्रत्येक गतिविधि स्वयंसेवकों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं संगठनात्मक विकास को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती है।

🚩

शाखा प्रारम्भ एवं उष्ण व्यायाम

5 मिनट

सभी स्वयंसेवक निर्धारित समय पर शाखास्थल पर एकत्रित होते हैं। प्रारम्भिक उष्ण व्यायाम के माध्यम से शरीर को आगामी कार्यक्रमों के लिए तैयार किया जाता है।

☀️

अनिवार्य शारीरिक कार्यक्रम

15 मिनट

सूर्य नमस्कार, दण्ड, प्रहार, समता, संचलन तथा अन्य अनिवार्य शारीरिक अभ्यासों का नियमित प्रशिक्षण कराया जाता है।

🏃

सामूहिक खेल

15 मिनट

विभिन्न आयु वर्गों के अनुसार खेल कराए जाते हैं जिससे उत्साह, साहस, नेतृत्व, समन्वय एवं विजयी मानसिकता का विकास हो।

🧘

व्यायाम योग

10 मिनट

योगासन, प्राणायाम, संधि व्यायाम अथवा अन्य वैकल्पिक शारीरिक अभ्यास स्थानीय आवश्यकता के अनुसार कराए जाते हैं।

📖

बौद्धिक कार्यक्रम

10 मिनट

गीत, सुभाषित, अमृतवचन, कथा, चर्चा, प्रश्नोत्तरी तथा समाचार समीक्षा के माध्यम से विचारों का विकास एवं राष्ट्रबोध जागृत किया जाता है।

🟧

प्रार्थना एवं समापन

5 मिनट

शाखा का समापन संघ प्रार्थना के साथ होता है। प्रार्थना स्वयंसेवकों में राष्ट्रसेवा, समर्पण, अनुशासन एवं संगठन भावना को दृढ़ करती है।

एक घंटे का यह प्रशिक्षण जीवनभर साथ रहता है

शाखा का उद्देश्य केवल एक घंटे का कार्यक्रम सम्पन्न करना नहीं है, बल्कि स्वयंसेवकों में ऐसे स्थायी संस्कार विकसित करना है जो उनके व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक उत्तरदायित्व, सामाजिक व्यवहार तथा राष्ट्रसेवा के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शक बनें। नियमित शाखा व्यक्ति को अनुशासित, संगठित, आत्मविश्वासी, सेवा-भावी और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक बनने की प्रेरणा देती है।

सेवा ही संगठन की शक्ति

साप्ताहिक सेवा दिवस

स्वयंसेवकों के जीवन में सेवा भावना जागृत करने के उद्देश्य से शाखा की रचना में एक दिन साप्ताहिक सेवा दिवस के रूप में निर्धारित किया जाता है। इसका उद्देश्य समाज के प्रति संवेदनशीलता, उत्तरदायित्व तथा सेवा संस्कारों का विकास करना है।

📖

प्रेरक प्रसंग

किसी महापुरुष, संत या समाजसेवी के जीवन से सेवा, त्याग एवं समर्पण से जुड़े प्रेरणादायक प्रसंग सुनाए जाते हैं, जिससे स्वयंसेवकों में सेवा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हो।

🤝

सेवा कार्यों का परिचय

समाज में चल रहे उत्कृष्ट सेवा कार्यों का परिचय कराया जाता है तथा अनुभवी कार्यकर्ताओं द्वारा उनके अनुभव साझा किए जाते हैं।

❤️

प्रत्यक्ष सेवा अनुभव

स्वयंसेवकों को ऐसे कार्यों में सहभागी बनाया जाता है जिससे उन्हें सेवा का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हो और समाज की वास्तविक आवश्यकताओं को समझने का अवसर मिले।

सेवा दिवस की संभावित गतिविधियाँ

  • श्रमदान
  • स्वच्छता अभियान
  • वृक्षारोपण
  • सेवा बस्ती भ्रमण
  • धार्मिक स्थलों की सफाई
  • सामाजिक जागरूकता अभियान

विशेष सेवा कार्य

  • रक्तदान शिविर
  • नेत्रदान संकल्प
  • अस्पताल सेवा
  • दिव्यांग सहायता
  • साक्षरता अभियान
  • सामाजिक समरसता कार्यक्रम

सेवा ही शाखा का प्राण है

शाखा का उद्देश्य केवल शारीरिक एवं बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं है। सेवा दिवस के माध्यम से स्वयंसेवकों में समाज के प्रति संवेदनशीलता, सहयोग, समरसता तथा राष्ट्रहित में कार्य करने का व्यावहारिक संस्कार विकसित किया जाता है। यही संस्कार शाखा को एक जीवंत सामाजिक संगठन का स्वरूप प्रदान करते हैं।

विशेष आयोजन

नैमित्तिक कार्यक्रम

दैनिक शाखा के अतिरिक्त समय-समय पर ऐसे विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जो स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व विकास, संगठनात्मक कौशल, सेवा भावना तथा सामाजिक सहभागिता को और अधिक सुदृढ़ बनाते हैं। इन्हें नैमित्तिक कार्यक्रम कहा जाता है।

🏕️

शिविर एवं शिक्षा वर्ग

शिविर, नैपुण्य वर्ग एवं संघ शिक्षा वर्गों के माध्यम से अनुशासन, आत्मनिर्भरता, नेतृत्व क्षमता तथा संगठनात्मक प्रशिक्षण का विकास किया जाता है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम
🥣

सहभोज एवं चन्दन

सहभोज, चन्दन एवं पारिवारिक मिलन जैसे कार्यक्रम सामाजिक समरसता, आत्मीयता तथा पारिवारिक वातावरण को सुदृढ़ बनाते हैं।

समरसता कार्यक्रम
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पथ संचलन एवं वार्षिकोत्सव

पथ संचलन, वार्षिकोत्सव तथा सार्वजनिक कार्यक्रम समाज में संगठन, अनुशासन एवं राष्ट्रभाव का प्रभावी परिचय कराते हैं।

सार्वजनिक आयोजन
🌳

वनविहार एवं भ्रमण

वनविहार, ट्रिप तथा विभिन्न स्थानों का भ्रमण स्वयंसेवकों में साहस, आत्मनिर्भरता, सहयोग एवं प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करता है।

प्रकृति एवं साहस
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सेवा अभियान

रक्तदान, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, सेवा बस्ती भ्रमण तथा सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम समाज सेवा का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

सेवा कार्य
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विशेष बैठकें

परिवार मिलन, विषय आधारित बैठक, बौद्धिक गोष्ठी, संग्रहालय अथवा ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण स्वयंसेवकों के ज्ञान एवं दृष्टिकोण का विस्तार करता है।

बौद्धिक विकास

नैमित्तिक कार्यक्रमों का उद्देश्य

1

नेतृत्व

दायित्व निभाने एवं संगठन संचालन की क्षमता विकसित करना।

2

सामूहिक जीवन

एक साथ रहना, सहयोग करना एवं अनुशासित वातावरण में कार्य करना।

3

सेवा भावना

समाज के प्रति संवेदनशीलता एवं निस्वार्थ सेवा का व्यवहारिक अनुभव।

4

राष्ट्र निर्माण

व्यक्तित्व निर्माण के माध्यम से समाज एवं राष्ट्र को सशक्त बनाना।

नियमित शाखा से आगे का प्रशिक्षण

नैमित्तिक कार्यक्रम स्वयंसेवकों को दैनिक शाखा से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक जीवन का अनुभव प्रदान करते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से संगठन, सेवा, नेतृत्व, समरसता, आत्मनिर्भरता एवं राष्ट्रभक्ति के संस्कार व्यवहारिक रूप में विकसित होते हैं, जिससे स्वयंसेवक समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार होता है।

बौद्धिक विकास

बौद्धिक योजना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में शारीरिक कार्यक्रमों के साथ-साथ बौद्धिक विकास पर भी समान बल दिया जाता है। इसका उद्देश्य स्वयंसेवकों में राष्ट्रबोध, भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, नेतृत्व क्षमता तथा सकारात्मक चिंतन का विकास करना है।

📚

कण्ठस्थ विभाग

  • संघ गीत
  • संघ प्रार्थना
  • सुभाषित
  • अमृतवचन
  • एकात्मता स्तोत्र
  • एकात्मता मंत्र
  • भोजन मंत्र
🎓

ज्ञान एवं संवाद

  • प्रश्नोत्तरी
  • प्रश्न मंच
  • चर्चा
  • प्रवचन
  • कथा एवं प्रेरक प्रसंग
  • समाचार समीक्षा
  • बौद्धिक वर्ग
गीत एवं प्रार्थना
शाखा में प्रतिदिन गीत एवं प्रार्थना का अभ्यास कराया जाता है। इसका उद्देश्य राष्ट्रभक्ति, अनुशासन तथा सामूहिक भावना को विकसित करना है। स्वयंसेवकों को गीत का अर्थ समझना तथा उसे कण्ठस्थ करना भी अपेक्षित है।
सुभाषित एवं अमृतवचन
सुभाषित, संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के श्रेष्ठ विचारों का संकलन हैं। अमृतवचन महापुरुषों के प्रेरणादायक विचार हैं जो स्वयंसेवकों में सेवा, त्याग, समर्पण तथा चरित्र निर्माण की प्रेरणा उत्पन्न करते हैं।
समाचार समीक्षा एवं चर्चा
समसामयिक राष्ट्रीय एवं सामाजिक विषयों पर चर्चा, समाचार समीक्षा एवं प्रश्नोत्तर के माध्यम से स्वयंसेवकों में विश्लेषण क्षमता, राष्ट्रबोध एवं सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया जाता है।
बौद्धिक वर्ग
बौद्धिक वर्गों में भारतीय संस्कृति, इतिहास, समाज, संगठन, महापुरुषों का जीवन, सेवा कार्य तथा राष्ट्र जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों का अध्ययन एवं विचार-विमर्श कराया जाता है।

"शारीरिक शक्ति के साथ श्रेष्ठ विचार ही पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं"

बौद्धिक योजना का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है, बल्कि ऐसे संस्कारित, विचारवान एवं राष्ट्रनिष्ठ स्वयंसेवकों का निर्माण करना है जो समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक नेतृत्व प्रदान कर सकें। ज्ञान, विचार और आचरण का समन्वय ही शाखा की बौद्धिक योजना की वास्तविक पहचान है।

व्यक्तित्व निर्माण का आधार

शारीरिक योजना

संघ की शाखा केवल खेल अथवा व्यायाम का स्थान नहीं है, बल्कि यह अनुशासन, आत्मविश्वास, साहस, नेतृत्व, संगठन तथा राष्ट्रसेवा के संस्कारों का व्यवहारिक प्रशिक्षण केन्द्र है। शारीरिक योजना का उद्देश्य प्रत्येक स्वयंसेवक को स्वस्थ, सजग, सक्षम एवं उत्तरदायी नागरिक बनाना है।

शारीरिक योजना का उद्देश्य

शाखा में होने वाले प्रत्येक शारीरिक कार्यक्रम का उद्देश्य केवल शरीर को मजबूत बनाना नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि एवं व्यवहार में संतुलन स्थापित करना भी है। नियमित अभ्यास से स्वयंसेवकों में आत्मविश्वास, साहस, त्वरित निर्णय क्षमता, अनुशासन तथा नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं।

योग, सूर्य नमस्कार, दण्ड, समता, संचलन, खेल एवं सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से स्वयंसेवकों में सहयोग, संगठन तथा सेवा की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।

विशेष उद्देश्य : शारीरिक योजना का अंतिम लक्ष्य ऐसा स्वयंसेवक तैयार करना है जो विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस, अनुशासन तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए समाज के लिए सक्रिय भूमिका निभा सके।
💪

शारीरिक क्षमता

नियमित अभ्यास से शरीर स्वस्थ, सक्रिय एवं ऊर्जावान बनता है।

🛡️

साहस एवं आत्मविश्वास

दैनिक प्रशिक्षण कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है।

🤝

अनुशासन एवं संगठन

सामूहिक अभ्यास के माध्यम से नेतृत्व, सहयोग एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है।

☀️
सूर्य नमस्कार

स्वास्थ्य, लचीलापन एवं मानसिक एकाग्रता का आधार।

🏃
व्यायाम

शरीर की शक्ति, संतुलन एवं सहनशक्ति का विकास।

⚔️
दण्ड एवं नियुद्ध

साहस, आत्मरक्षा, आत्मविश्वास एवं समन्वय का अभ्यास।

🧘
योग एवं प्राणायाम

शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक संतुलन एवं आत्मनियंत्रण।

"स्वस्थ शरीर, अनुशासित मन और राष्ट्रनिष्ठ चरित्र — यही शाखा की शारीरिक योजना का लक्ष्य है।"

शाखा की शारीरिक योजना व्यक्ति को केवल बलवान नहीं बनाती, बल्कि उसे संयमित, उत्तरदायी, साहसी एवं समाज के लिए सदैव तत्पर नागरिक के रूप में विकसित करती है। यही कारण है कि शाखा का प्रत्येक अभ्यास जीवनभर उपयोगी संस्कार प्रदान करता है।

आचार विभाग

शाखा लगाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया

संघ की शाखा एक सुव्यवस्थित एवं अनुशासित पद्धति पर आधारित है। प्रत्येक कार्यक्रम निश्चित क्रम में सम्पन्न होता है जिससे स्वयंसेवकों में अनुशासन, समयपालन, संगठन तथा सामूहिक कार्य की भावना विकसित होती है।

1

शाखा प्रारम्भ

मुख्य शिक्षक द्वारा सीटी बजाए जाने पर सभी स्वयंसेवक आपसी बातचीत बन्द कर ध्वजाभिमुख आरम् की स्थिति में खड़े होते हैं। यही शाखा के औपचारिक प्रारम्भ का संकेत होता है।

2

सम्पत् एवं अग्रेसर व्यवस्था

मुख्य शिक्षक की आज्ञा पर अग्रेसर नियत स्थान ग्रहण करते हैं तथा सभी स्वयंसेवक अपने-अपने गण में अनुशासित रूप से सम्पत् होकर खड़े होते हैं।

3

ध्वजारोपण एवं ध्वज प्रणाम

ध्वज निर्धारित विधि से स्थापित किया जाता है। तत्पश्चात सभी स्वयंसेवक भगवा ध्वज को प्रणाम कर राष्ट्र एवं संगठन के प्रति अपनी श्रद्धा एवं समर्पण व्यक्त करते हैं।

4

संख्या एवं उपस्थिति

गणवार संख्या ली जाती है तथा मुख्य शिक्षक को कुल उपस्थित स्वयंसेवकों की जानकारी दी जाती है। इससे शाखा का सुव्यवस्थित संचालन सुनिश्चित होता है।

5

स्वस्थान एवं कार्यक्रम

गणशिक्षक स्वयंसेवकों को उनके-उनके स्थान पर ले जाकर शारीरिक, खेल, व्यायाम, बौद्धिक एवं अन्य निर्धारित कार्यक्रम सम्पन्न कराते हैं।

6

प्रार्थना एवं विकिर

शाखा का समापन संघ प्रार्थना, ध्वज प्रणाम तथा विकिर की आज्ञा के साथ होता है। इसके पश्चात स्वयंसेवक दैनिक जीवन में राष्ट्रकार्य की प्रेरणा लेकर अपने-अपने कार्यों के लिए प्रस्थान करते हैं।

अनुशासन ही शाखा की पहचान है

शाखा की सम्पूर्ण प्रक्रिया केवल औपचारिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह अनुशासन, संगठन, नेतृत्व, समयपालन एवं सामूहिक जीवन का व्यवहारिक प्रशिक्षण है। प्रतिदिन इसी क्रम का अभ्यास स्वयंसेवकों के जीवन में स्थायी संस्कारों का निर्माण करता है और उन्हें समाज एवं राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।

शाखा संचालन

शाखा लगाने की 18 आज्ञाएँ

संघ की शाखा का संचालन निर्धारित आज्ञाओं के अनुसार किया जाता है। प्रत्येक आज्ञा अनुशासन, समन्वय एवं सुव्यवस्थित शाखा संचालन का आधार है। नीचे शाखा प्रारम्भ से लेकर स्वस्थान तक की सभी प्रमुख आज्ञाएँ क्रमवार दी गई हैं।

1
संघ दक्ष
2
आरम्
3
अग्रेसर
4
अग्रेसर सम्यक्
5
आरम्
6
संघ सम्पत्
7
संघ दक्ष
8
संघ सम्यक्
9
अग्रेसर अर्धवृत्
10
संघ आरम्
11
संघ दक्ष (ध्वजारोपण)
12
ध्वज प्रणाम (1-2-3)
13
संख्या
14
आरम्
15
संघ दक्ष
16
आरम्
17
संघ दक्ष
18
स्वस्थान

आज्ञाओं का महत्व

शाखा की प्रत्येक आज्ञा केवल एक निर्देश नहीं है, बल्कि अनुशासन, समयपालन, नेतृत्व, संगठन एवं सामूहिक कार्यपद्धति का व्यवहारिक प्रशिक्षण है। इन आज्ञाओं का नियमित अभ्यास स्वयंसेवकों में आदेश पालन, उत्तरदायित्व, एकरूपता तथा संगठनात्मक दक्षता का विकास करता है। यही सुव्यवस्थित प्रणाली शाखा को प्रभावी एवं प्रेरणादायी बनाती है।

शाखा समापन प्रक्रिया

शाखा विकिर की 12 आज्ञाएँ

दैनिक शाखा के समापन की भी एक निश्चित एवं अनुशासित प्रक्रिया होती है। प्रार्थना के पश्चात ध्वज प्रणाम, ध्वज अवतरण तथा विकिर की आज्ञाओं के माध्यम से शाखा का विधिवत समापन किया जाता है।

1

अग्रेसर सम्यक्

समापन के लिए अग्रेसर सम्पूर्ण रचना को सम्यक् करते हैं।

2

आरम्

सभी स्वयंसेवक निर्धारित स्थिति में आरम् करते हैं।

3

संघ सम्पत्

समापन हेतु सम्पूर्ण शाखा पुनः व्यवस्थित रचना में आती है।

4

संघ दक्ष

सभी स्वयंसेवक अनुशासित दक्ष स्थिति में खड़े होते हैं।

5

संघ सम्यक्

रचना का अंतिम निरीक्षण एवं संतुलन सुनिश्चित किया जाता है।

6

अग्रेसर अर्धवृत्

अग्रेसर आवश्यक व्यवस्था पूर्ण करते हैं।

7

संख्या

उपस्थित स्वयंसेवकों की अंतिम संख्या ली जाती है।

8

आरम्

अगली प्रक्रिया के लिए सभी स्वयंसेवक तैयार रहते हैं।

9

संघ दक्ष

प्रार्थना प्रारम्भ होने से पूर्व अंतिम दक्ष स्थिति।

10

संघ प्रार्थना

सभी स्वयंसेवक सामूहिक रूप से संघ प्रार्थना करते हैं।

11

ध्वज प्रणाम

भगवा ध्वज को प्रणाम कर ध्वज अवतरण की प्रक्रिया पूर्ण होती है।

12

संघ विकिर

शाखा का औपचारिक समापन कर स्वयंसेवक अपने कार्य हेतु प्रस्थान करते हैं।

शाखा समापन का क्रम

  1. सम्पूर्ण शाखा पुनः अनुशासित रचना में एकत्रित होती है।
  2. संख्या एवं उपस्थिति की पुष्टि की जाती है।
  3. सभी स्वयंसेवक संघ प्रार्थना में सहभागी होते हैं।
  4. ध्वज प्रणाम एवं ध्वज अवतरण सम्पन्न किया जाता है।
  5. विकिर की आज्ञा के साथ शाखा का विधिवत समापन होता है।
शाखा अनुशासन

आवश्यक सूचनाएँ एवं शाखा अनुशासन

शाखा का प्रभाव केवल उसके कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों के अनुशासन, समयपालन, व्यवहार एवं संगठनात्मक मर्यादा से भी दिखाई देता है। निम्नलिखित निर्देश प्रत्येक स्वयंसेवक के लिए उपयोगी एवं प्रेरणादायक हैं।

⏰

समयपालन

शाखा में निर्धारित समय से पहले पहुँचने का प्रयास करें। समय पर उपस्थिति स्वयंसेवक के अनुशासन एवं उत्तरदायित्व का परिचायक है।

🚩

ध्वज सम्मान

भगवा ध्वज शाखा का प्रेरणा केन्द्र है। ध्वज के प्रति श्रद्धा, सम्मान एवं निर्धारित पद्धति से ध्वज प्रणाम करना प्रत्येक स्वयंसेवक का कर्तव्य है।

🤝

सामूहिक अनुशासन

आज्ञाओं का पालन, गण व्यवस्था, सहयोग एवं सामूहिक कार्य ही शाखा की वास्तविक शक्ति हैं। प्रत्येक स्वयंसेवक को अनुशासनपूर्वक सहभागिता करनी चाहिए।

महत्वपूर्ण निर्देश

✓ शाखा स्थल को सदैव स्वच्छ एवं व्यवस्थित रखें।
✓ विलम्ब से आने पर पहले ध्वज प्रणाम करें, फिर अधिकारी से अनुमति लें।
✓ शाखा के दौरान अनावश्यक बातचीत एवं मोबाइल का उपयोग न करें।
✓ प्रत्येक आज्ञा का पालन एकरूपता एवं अनुशासन के साथ करें।
✓ प्रार्थना के समय पूर्ण एकाग्रता एवं श्रद्धा बनाए रखें।
✓ शाखा समाप्ति के बाद भी सेवा एवं संगठन भावना बनाए रखें।

अनुशासन से ही संगठन सशक्त बनता है

शाखा का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है जब स्वयंसेवक शाखा के अनुशासन, समयपालन, सेवा भावना तथा राष्ट्रभक्ति के संस्कारों को अपने दैनिक जीवन में भी अपनाते हैं। यही संस्कार संघ की कार्यपद्धति को विशिष्ट एवं प्रभावी बनाते हैं।

प्रेरणा के स्रोत

शाखा से जुड़े प्रेरणादायक विचार

शाखा केवल दैनिक कार्यक्रमों का समूह नहीं है, बल्कि जीवन को राष्ट्र, समाज एवं संस्कृति के प्रति समर्पित करने वाली एक प्रेरक साधना है। महापुरुषों के विचार शाखा के वास्तविक उद्देश्य को समझने में हमारी सहायता करते हैं।

शाखा का उद्देश्य

"शाखा का लक्ष्य केवल एक घंटे का कार्यक्रम चलाना नहीं, बल्कि ऐसे स्वयंसेवकों का निर्माण करना है जो अपने सम्पूर्ण जीवन को राष्ट्रहित के लिए समर्पित कर सकें।"

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल भाव

अनुशासन

"अनुशासन वह शक्ति है जो साधारण व्यक्तियों को भी असाधारण कार्य करने की क्षमता प्रदान करती है। नियमित शाखा इस अनुशासन का व्यवहारिक प्रशिक्षण देती है।"

संघ कार्यपद्धति

सेवा

"सच्ची सेवा वही है जिसमें किसी प्रकार की अपेक्षा न हो, केवल समाज और राष्ट्र के कल्याण का भाव हो।"

सेवा ही संगठन की शक्ति

संगठन

"व्यक्ति महान हो सकता है, किन्तु संगठित समाज अजेय होता है। शाखा संगठन निर्माण की प्रयोगशाला है।"

संघ विचार

राष्ट्रभक्ति

"राष्ट्र प्रथम — यही शाखा का मूल संस्कार है। प्रत्येक स्वयंसेवक अपने आचरण से राष्ट्रहित को सर्वोच्च स्थान देने का अभ्यास करता है।"

राष्ट्र सर्वोपरि

चरित्र निर्माण

"शक्ति, ज्ञान, सेवा और संस्कार—इन चारों का समन्वय ही श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण करता है।"

व्यक्तित्व विकास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ध्वज का आकार -

आकार के ध्वजों को बनाते समय उसकी बाजुओं का मितिप्रमाण साथ में दिये हुए चित्र में दर्शाया है।

प्रतिदिन के शाखा के ध्वज की लंबरूप ऊँचाई 75 सेमी. चाहिए, ध्वजदंड की ऊँचाई 2.5 मीटर चाहिए।

सम्यक् की पद्धति :-

(7) संघ दक्ष ( 8 ) संघ सम्यक आज्ञा होते ही सब अग्रेसर अर्धवृत् कर अपने अपने गणों का अथवा गटों का सम्यक् देखेंगे। सम्यक् देखते समय हाथ न हिलाते हुए यथावश्यक मौखिक सूचनाएँ दी जानी चाहिए। सम्यक् देखने के लिए जब अग्रेसर अर्धवृत्त करता है तो वह पंक्त्ति से थोड़ा दाई ओर हट जाता है। अतः उसे पंक्ति को अपने सामने लाते हुए अपनी नाक की सीध में सभी का दाँया कान है- यह देखना चाहिए। अन्यथा पुनः अर्धवृत्त करने पर वह पंक्ति से बाहर बाँई ओर हट जाएगा। (9) अग्रेसर अर्धवृत् सब अग्रेसर – अर्धवत् करेंगे। (10) संघ आरम्- स्वयंसेवकों को ध्वजारोपण के लिए प्रस्तुत करने की दृष्टि से दक्ष करने के पूर्व उनसे एक बार आरम् (इसके पूर्व की आज्ञा अग्रेसरों के लिए होने के कारण और अब आरम् सभी को करना है अतः इस समय सघ आरम्’ की आज्ञा देना आवश्यक है) कराना आवश्यक है।

(11) संघ दक्ष :- सब स्वयंसेवकों के दक्ष स्थिति में आने पर ध्वज लगाने वाला स्वयंसेवक प्रचलन करते हए लघुतम मार्ग से ध्वजमंडल के अंदर ध्वजस्थान के सम्मुख पर्याप्त निकट जाकर स्तभ् करेगा। ध्वजारोपण के हेतु उसी स्थान से ध्वजदंड उठाकर उसे अपनी बाँयी बगल के आधार से तिरछा (संपत् रेखा की ओर लंबवत्) स्थिर रखकर दोनों हाथों का उपयोग करते हुए उस पर ध्वज चढ़ाएगा। पश्चात् ध्वजदंड का निम्न छोर ध्वजस्थान की बैठक में फँसाएगा। पश्चात् ध्वजमंडल के बाहर आकर ध्वजप्रणाम कर एक कदम पीछे जाएगा और प्रचलन करते हुए लघुतम मार्ग से दक्षिणतम अग्रेसर के दाहिनी ओर दो कदम अन्तर पर पहुँचकर अर्धवृत् कर खड़ा होगा।

(12) ध्वजप्रणाम 1-2-3 :- एक, दो, तीन आज्ञाएँ हैं, अंकताल नहीं, यह जानकर आज्ञा के पश्चात् क्रिया होनी चाहिये । (13) संख्या :- प्रतति में खड़ा हुआ अंत का स्वयंसेवक दाँया पैर 60 सें.मी. दाँयी ओर लेकर बाँया पैर मिलाए और संख्या गिनता हुआ (प्रचल करते हुए) अग्रेसर के बाजू में स्तभ करेगा और

उसे पंक्ति की संख्या बतलाकर ( सामने देखकर अग्रेसर को सुनाई दे इतनी आवाज में) खड़ा रहेगा।

(14) आरम् :- आज्ञा होते ही उपरोक्त स्वयंसेवक अर्धवृत कर प्रचलन करते हुए गण अथवा गट के अन्त तक जाकर स्तम् और अर्धवृत् कर 60 से.मी. बाँयी ओर हट कर अपने स्थान पर सम्यक देखकर आरम् कर खड़ा होगा। उपर्युक्त आज्ञा होने पर संख्या-गणक एक कदम (75 से.मी.) आगे आकर वामवृत् कर अग्रेसरों से क्रमश: (द्विपद पुरस् करते हुए) संख्या ज्ञात कर अंतिम अग्रेसर से एक कदम आगे जाकर तथा वामवृत कर प्राप्त संख्या के योग में अपनी संख्या जोड़कर मुख्यशिक्षक को बताएगा और अपनी बाँया पैर बाँयी ओर 60 से.मी. रखकर दहिना पैर मिलाए तथा दो कदम आगे जाकर, अर्धवृत कर मुख्यशिक्षक के बाजू में आरम् करके खड़ा होगा। (15) संघ दक्ष और (16) आरम् देकर मुख्यशिक्षक उपस्थित प्रमुख अधिकारी को संख्या गणक द्वारा प्राप्त संख्या में स्वयं की, अधिकारी की तथा संपत् रचना के बाहर के स्वयंसेवकों की संख्या जोड़कर बताएगा।

दक्ष द्वारा सम्मानित अधिकारी यदि उस समय संघस्थान पर हों तो मुख्यशिक्षक ने स्वयंसेवकों को संघ दक्ष देकर (क्र. 15 के पश्चात्) संख्या बताने के लिये जाना चाहिये। संख्या बताने के पश्चात् मुख्यशिक्षक एक कदम पीछे आकर स्वयंसेवकों की दिशा में घूमकर (पूर्ण रचना दृष्टिक्षेप में आवे उतना आवश्यक वर्तन) आरम् देकर अपने स्थान पर आवेगा। तदुपरान्त ( 17 ) संघ दक्ष (18) ‘स्वस्थान’ तब स्वयंसेवक अपने अपने गणस्थान पर जाकर गणशिक्षक की आज्ञानुसार संपत् करेंगे। जहाँ स्वयंसेवक गणानुसार खड़े हैं वहाँ स्वस्थान के पश्चात् गणशिक्षक ही अपने गणों को ले जाएंगे।

सामने अधिकारी उपस्थित न हाने की स्थिति में (15) संघ दक्ष के पश्चात् सीधे स्वस्थान देना। (यदि स्वयंसेवकों को स्वस्थान के बाद भी उसी रचना में रोकना हो तो स्वस्थान के बाद ‘आरम्’ की आज्ञा देनी चाहिए। ऐसा होने पर शिक्षक गणों को नहीं ले जाएंगे। सूचना या सामूहिक कार्यक्रम के पश्चात् गणों को ले जाने के लिए सूचना मात्र देनी चाहिए।

विलंब से आने वाले स्वयंसेवक :- यदि कोई स्वयंसेवक विलम्ब से आए तो वह सर्वप्रथम ध्वज के सम्मुख (संपत रेखा पीठ की ओर रहेगी) आकर ध्वज को प्रणाम करे, बाद में उपस्थित सर्वोच्च अधिकारी को प्रणाम कर उनकी अनुमति लेकर अपने गणशिक्षक की अनुमति से गण के कार्यक्रम में सम्मिलित हो। (ध्वजारोपण के समय जो स्वयंसेवक शाखा संपत् की रचना में खड़े नहीं हो पाए वे विलंब से आने वाले माने जाएंगे)

विलंब से आने पर स्वयंसेवक को पहले ध्वजप्रणाम और उसके बाद अधिकारी प्रणाम करना होता है। किसी भी स्थिति में दो बार ध्वजप्रणाम करना उचित नहीं । यदि प्रणाम अधिकारी कार्यक्रम करने/ कराने में व्यस्त हैं, तो उनकी ओर मुँह करके प्रणाम कर लेना चाहिए।

ध्वज विलम्ब से आने पर :- मुख्यशिक्षक द्वारा सभी स्वयंसेवकों को दक्ष की सूचना (-) देने के पश्चात् ध्वज लगाने वाला स्वयंसेवक ध्वज लगाएगा और एक कदम पीछे आकर प्रणाम करेगा तत्पश्चात् मुख्यशिक्षक द्वारा सभी स्वयंसेवकों को पूर्ववत की सूचना (००, ००) दी जाएगी। सभी स्वयंसेवकों को पुनः प्रणाम करने की आवश्यकता नहीं ।

ध्वज लगने के बाद संघचालक का आगमन :- (मा. संघचालक) (अथवा जिन्हें दक्ष द्वारा सम्मान प्रदान किया जाता है, ऐसे अधिकारी) के संघस्थान की सीमा में प्रवेश करते ही मुख्यशिक्षक सीटी (–) बजाएगा। तत्पश्चात् सभी स्वयंसेवक अपने काम बंद कर (विस्तार के कारण आवश्यकता होने पर गणशिक्षक की आज्ञा से) । ध्वजाभिमुख होकर दक्ष करेंगे। मा. संघचालक के साथ आए हुए अन्य अधिकारी तथा स्वयंसेवक भी दक्ष की ही स्थिति में खड़े रहेंगे। मा. संघचालक (अथवा तत्सम उच्च अधिकारी) के ध्वजप्रणाम करने के पश्चात् संघस्थान पर उपस्थित सर्वोच्च अधिकारी मा. संघचालक को प्रणाम करेंगे। तत्पश्चात् सीटी (००, ००) बजने पर शाखा के कार्यक्रम पूर्ववत् प्रारंभ होंगे। उच्चाधिकारी के साथ आए हुए अन्य अधिकारी और स्वयंसेवक ध्वज प्रणाम कर उनको प्रणाम करेंगे।

प्रार्थना के पूर्व जाने वाले स्वयंसेवक :- याद कोई स्वयंसेवक प्रार्थना के पूर्व जाना चाहता है तो वह कार्यवाह की अनुमति । लेकर संघस्थान पर उपस्थित सर्वोच्च अधिकारी को प्रणाम करेगा। बाद में ध्वज को प्रणाम कर संघस्थान छोड़ेगा।

दक्ष द्वारा सम्मानित अधिकारी यदि प्रार्थना के पूर्व ही संघस्थान छोड़ रहे हों तो सभी स्वयंसेवकों को ध्वजाभिमुख दक्ष की स्थिति में खड़े कराने के लिए मुख्यशिक्षक सीटी (–) बजावेगा। जाते समय ● अधिकारी पहले ध्वज प्रणाम करेंगे। निकटतम निम्न अधिकारी उनके बाँयी ओर रहते हुए संघस्थान की सीमा तक उनके साथ जाएगा और वहाँ पर उनको प्रणाम करेंगे। इसके पश्चात् उच्चाधिकारी संघस्थान की सीमा छोड़ेंगे। उच्चाधिकारी के संघस्थान छोड़ चुकने के बाद मुख्यशिक्षक सीटी (००, ००) बजाएगा और तब शाखा के कार्यक्रम पूर्ववत् चालू होंगे। अन्य श्रेणी के अधिकारी यदि शाखा समाप्ति के पूर्व जाते हैं, तो निकटतम निम्न श्रेणी के अधिकारी उनको प्रणाम करेंगे। तत्पश्चात् जानेवाले अधिकारी ध्वज को प्रणाम कर संघस्थान छोड़ेंगे।

शाखा विसर्जन :- प्रार्थना के हेतु संपत् कराने के लिए मुख्यशिक्षक सीटी (-०००) बजाएगा। सब अग्रेसर (अभ्यागत सहित) अपने नियोजित स्थान पर पहुँच कर क्रमानुसार दक्ष में खड़े रहेंगे । मुख्यशिक्षक इनका अंतर ठीक कराकर और 1) अग्रेसर सम्यक् आज्ञा देकर उनका सम्यक् देखकर 2) अग्रेसर आरम् देगा। दूसरी सीटी (-००) बजते ही अग्रेसर दक्ष करेंगे व गणशिक्षक अपने गणों को रचना के पास लाकर स्वस्थान की आज्ञा देंगे। रचना के पास लाकर ‘स्वस्थान’ देने के लिए गण को ‘स्तम्’ देना अनिवार्य नहीं है। तब सब स्वयंसेवक गटशः अथवा गणशः संपत् होकर सम्यक् देखकर क्रमशः स्वयं आरम् करेंगे। तत्पश्चात् मुख्यशिक्षक सबको 3) संघ दक्ष 4) संघ सम्यक् 5) अग्रेसर अर्धवृत् 6) संख्या 7) आरम् इस क्रम से आज्ञा देगा।

प्रार्थना कहलाने वाला स्वयंसेवक ही संख्या गणक का कार्य करेगा। प्रार्थना के लिये संपत् के समय ही वह दक्षिणतम अग्रेसर के दाहिनी ओर प्रार्थना के लिये खड़ा होगा। उस समय इस स्वयंसेवक

के पास दंड नहीं होगा। यदि सूचनाएं देनी हों तो वे संख्या लिए जाने के उपरान्त | प्रार्थना के पूर्व आरम् स्वस्थ’ देकर स्वस्थ की स्थिति में ही दी जानी चाहियें।

उपस्थित प्रमुख अधिकारी (यदि वह दक्ष द्वारा सम्मानित अधिकारी हो तो सब स्वयंसेवकों को दक्ष करा कर) को संख्या (गणक द्वारा प्राप्त संख्या में स्वयं की, अधिकारी की तथा संपत् रचना के बाहर के और छुट्टी लेकर गए हुए स्वयंसेवकों की संख्या जोड़कर) बताकर प्रार्थना के लिए उनकी अनुमति लेकर पश्चात् मुख्यशिक्षक (आरम देकर) अपने स्थान पर आवेगा व तदुपरान्त संघ दक्ष देकर सीटी (0) बजाकर प्रार्थना करावेगा। प्रार्थना के बाद, 8) ध्वजप्रणाम होगा, पश्चात प्रार्थना कहनेवाला स्वयंसेवक निकटतम मार्ग से जाकर ध्वजमंडल के बाहर ध्वज के सम्मुख खड़े होकर ध्वज को प्रणाम कर ध्वजमंडल के अंदर जाकर ध्वजदंड बैठक से निकाल कर अपनी बाँयीं बगल के आधार पर तिरछा रखकर स्थिर रखते हुए दाहिने हाथ से ध्वज निकालेगा और उसे पूर्ण तह कर, ध्वजदंड रखकर, बाँएं हाथ की मुट्ठी में ध्वज लेकर, मुख्यशिक्षक के बाजू में पहुँचकर उसके दाहिनी ओर अर्धवृत कर खड़ा होगा। पश्चात् 9) “संघविकिर” की आज्ञा दी जावेगी ।

विकिर की आज्ञा होने पर सब स्वयंसेवक दाहिनी ओर घूम कर ही प्रणाम करेंगे। तथा 4 अंक मन में गिनकर ही जगह छोड़ेंगे। परन्तु सर्वोच्च अधिकारी तथा प्रार्थना कहलाने वाला स्वयंसेवक और मुख्यशिक्षक उसी स्थिति में सब के साथ प्रणाम कर विकिर करेंगे।

शाखा का दैनिक कार्य इसी प्रकार हो यह ध्यान में रखना चाहिये। विशेष कार्यक्रम के अवसर पर स्थान के अनुरूप प्रसंगोचित व्यवस्था करनी चाहिए। सघ शिक्षा वर्गों, शिविरों की संपत् रचना में यदि मा. अधिकारी तथा मुख्य शिक्षक स्वयंसेवकाभिमुख खड़े हों तो उस समय भी मा. अधिकारी को संख्या बताते समय संख्या बताने के पश्चात् मुख्य शिक्षक एक कदम पीछे हटकर (बाजू में नहीं) ‘आरम्’ देकर अपने स्थान पर जावेगा।

1. प. पू. सरसंघचालक एवं मा. सरकार्यवाह को दक्ष द्वारा सम्मानित किया जाता है। समस्त संघचालकों को भी उनके अपने कार्यक्षेत्र

में दक्ष द्वारा सम्मानित किया जाता है।

2. प्रणाम करने की दृष्टि से निम्नलिखित श्रेणी है :-

(अ) प.पू सरसंघचालक (आ) मा. सरकार्यवाह

(इ) मा. क्षेत्र – प्रांत-विभाग-जिला- तहसील तथा स्थानीय संघचालक (ई) सहसरकार्यवाह, क्षेत्र कार्यवाह तथा प्रांत कार्यवाह से

लेकर यथोक्त क्रम से स्थानीय शाखा कार्यवाह तक । 3. प्रणाम करते समय तीन क्रमों में ही करना चाहिये। ध्वजप्रणाम, अधिकारी प्रणाम, विकिर पद्धति के अंतर्गत किए जाने वाले प्रणाम, सरसंघचालक प्रणाम, आद्य सरसंघचालक प्रणाम तथा स्वागत (अध्यक्षीय) प्रणाम की पद्धति में कोई अंतर नहीं है।

दैनिक शाखा में ध्वजस्तंभ सामान्यतः 2.5 मीटर ऊँचा हो, बैठक को केन्द्र मानकर 90 सें.मी. त्रिज्या का मंडल अथवा मंडलांश बनाना चाहिये उसका सीमांकन करते हुए ध्वजस्थान सादे ही ढंग से क्यों न हो स्वच्छ और सुशोभित रखना चाहिये। जिन शाखाओं में ध्वज नहीं लगाया जाता वहाँ के स्वयंसेवकों को ध्वजप्रणाम आदि बातों का संस्कार एवं अभ्यास कराने के लिये नियोजित स्थान पर ध्वज है ऐसा मानकर ध्वजप्रणाम आदि का व्यवहार हो । वह स्थान उपर्युक्त प्रकार से सीमांकित और स्वच्छ हो । शाखा में ध्वजारोपण हो जाने के पश्चात् किसी विशेष कारण से ध्वज को स्थानांतरित करना हो तो सब स्वयंसेवकों को दक्ष देकर ही वैसा करना चाहिये ।

4. बौद्धिक वर्ग या उस प्रकार के किसी अन्य कार्यक्रम के चालू रहते समय ध्वजप्रणाम के बाद आनेवाले स्वयंसेवकों को इस बात की सावधानी रखनी चाहिये कि अपने आगमन से अन्य स्वयंसेवकों का ध्यान विचलित न करते हुए पीछे की ओर जाकर (जहाँ बैठना हो उस स्थान पर) ध्वज तथा अधिकारी को प्रणाम कर बैठ जाना चाहिये ।

 

5. आवश्यक सूचनाएँ आदि देने का कार्य प्रार्थना के पूर्व ही कर लेने का नियम होने के कारण प्रार्थना के पश्चात् ध्वजप्रणाम होने पर “विकिर’ यह आज्ञा शाखा विसर्जन की अंतिम आज्ञा समझी जानी चाहिये ।

 

विशेष प्रसंगों पर किसी खास प्रयोजन से उसी रचना में स्वयंसेवकों को रोकना आवश्यक हो तो विकिर की आज्ञा के अनुसार स्वयंसेवकों द्वारा दक्षिणवृत् और प्रणाम करने पर वामवृत् की आज्ञा दें।

 

6. खतरे की चेतावनी की सीटी (- …..) बजते ही शिक्षक अपना-अपना गण तुरत्त संपत् कर मुख्यशिक्षक के संकेतानुसार कार्य करेंगे।

 

7. देश के विभिन्न केन्द्रों में चलनेवाले ‘संघ-शिक्षा- वर्ग’ बहुत बार किसी एक प्रांत तक या अंचलविशेष तक सीमित दिखाई देते हुए भी वास्तविकतया एक विशेष अखिल भारतीय स्वरूप का केंद्रित कार्यक्रम है। संघ शिक्षा वर्गों (द्वितीय तथा तृतीय वर्ष) में प्रणाम की दृष्टि से निम्न श्रेणी होगी ।

 

(अ) प.पू. सरसंघचालक

 

(आ) मा. सरकार्यवाह

 

(ई) में सहसरकार्यवाह

 

(ई) में सर्वशक्तिमान

 

(उ) मा. कक्षा का काम महामहिम सरसंघचालक, मा. सरकार्यवाह व मान. सर्वशक्तिमान द्वारा सम्मानित किया जाता है।

 

अब प्रथम वर्ष का वर्ग प्रान्तीय विषय होने के कारण उसमें नियुक्त किये जाने वाले वरिष्ठतम अधिकारी को ‘वर्गाधिकारी’ कहा जाएगा और मा. प्रांत संघचालक जी के प्रतिनिधि के नाते वे भी दक्ष द्वारा सम्मानित रहेंगे। प्रथम वर्ष में प्रणाम क्रम होगा प.पू. सरसंघचालक, मा. सरकार्यवाह, मा. क्षेत्र संघचालक, मा. प्रांत संघचालक, मा. वर्गाधिकारी, मा. सह सरकार्यवाह, मा. क्षेत्र कार्यवाह, वर्ग कार्यवाह, प्रांत कार्यवाह ।

 

8. वर्ष-प्रतिपदा प.पू. आद्यसरसंघचालक जी का जन्मदिन भी है। अतः इस दिन उन्हें प्रणाम दिया जाएगा (अध्यक्ष नियोजित हो तो अध्यक्षीय प्रणाम के पश्चात्) । सर्वोच्च अधिकारी प.पू. आद्य सरसंघचालक जी की प्रतिमा को माला चढ़ाकर प्रणाम करेंगे। तत्पश्चात् मुख्यशिक्षक आद्यसरसंघचालक प्रणाम 1-2-3 यह आज्ञा देकर ध्वज प्रणाम करावेगा। ध्वजारोपण, प्रणाम आदि कार्यक्रम इसके पश्चात् होंगे।

 

9. सीटी बजाने के संबंध में लंबी सीटी (-) छोटी सीटी (०)

 

1. ( – 0–0 ) शाखा प्रारंभ कराने के लिए।

 

2. (–000 ) शाखा के अंत में अग्रेसर संपत् कराने के लिए। 3. (00) शाखा के अंत में संपत् कराने के लिए गणशिक्षकों को सूचना ।

 

4. (०) कार्यक्रम में परिवर्तन के लिए । 5. ( – – ) सब स्वयंसेवकों को दक्ष की स्थिति में लाने के लिए ।

 

6. (00, 00) पूर्ववत् कराने के लिए। 7. (0) निर्धारित क्रिया कराने के लिए।

 

8. ( – – – ) खतरे की चेतावनी के लिए तीन या अधिक बार, (स्वयंसेवक सचेत होने तक)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संघ की शाखा से संबंधित सामान्य प्रश्न

नीचे दिए गए प्रश्न संघ की शाखा के बारे में सबसे अधिक पूछे जाने वाले प्रश्नों में से हैं। इनके माध्यम से शाखा की कार्यप्रणाली, उद्देश्य तथा सहभागिता को सरल भाषा में समझा जा सकता है।

1. संघ की शाखा क्या होती है?
शाखा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मूल कार्यपद्धति है, जहाँ प्रतिदिन निर्धारित समय एवं स्थान पर स्वयंसेवक शारीरिक, बौद्धिक एवं संगठनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण का अभ्यास करते हैं।
2. शाखा की अवधि कितनी होती है?
सामान्यतः दैनिक शाखा लगभग 60 मिनट की होती है। स्थानीय परिस्थिति के अनुसार समय में परिवर्तन हो सकता है।
3. शाखा में कौन-कौन से कार्यक्रम होते हैं?
शाखा में सूर्य नमस्कार, व्यायाम, खेल, गीत, सुभाषित, अमृतवचन, बौद्धिक चर्चा, प्रार्थना एवं अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
4. क्या शाखा में कोई भी जा सकता है?
हाँ, शाखा में आने के इच्छुक व्यक्ति स्थानीय शाखा से संपर्क कर सकते हैं और निर्धारित कार्यक्रमों में सहभागी बन सकते हैं।
5. शाखा में किस प्रकार का पहनावा होना चाहिए?
स्थानीय शाखा की व्यवस्था एवं कार्यक्रम के अनुसार सामान्य, सादा एवं सुविधाजनक वस्त्र पहनना उपयुक्त रहता है।
6. क्या शाखा केवल बच्चों के लिए होती है?
नहीं। शाखाओं में बाल, तरुण तथा प्रौढ़—सभी आयु वर्गों के लिए अलग-अलग प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
7. शाखा में खेल क्यों कराए जाते हैं?
खेलों के माध्यम से नेतृत्व, अनुशासन, सहयोग, आत्मविश्वास, साहस एवं सामूहिक भावना का विकास किया जाता है।
8. क्या शाखा में केवल शारीरिक प्रशिक्षण होता है?
नहीं। शाखा में शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ बौद्धिक विकास, राष्ट्रबोध, सेवा भावना एवं व्यक्तित्व निर्माण पर समान बल दिया जाता है।
9. शाखा का मुख्य उद्देश्य क्या है?
चरित्र निर्माण, संगठन, अनुशासन, सेवा भावना, नेतृत्व क्षमता तथा राष्ट्रहित में कार्य करने वाले स्वयंसेवकों का निर्माण करना।
10. शाखा की शुरुआत कैसे होती है?
मुख्य शिक्षक की आज्ञा, सम्पत, ध्वजारोपण एवं ध्वज प्रणाम के साथ शाखा का नियमित कार्यक्रम प्रारम्भ होता है।
11. शाखा का समापन कैसे होता है?
संघ प्रार्थना, ध्वज प्रणाम, ध्वज अवतरण तथा विकिर की आज्ञा के साथ शाखा का समापन होता है।
12. क्या शाखा में शुल्क देना पड़ता है?
स्थानीय व्यवस्थाएँ अलग हो सकती हैं। शाखा के बारे में जानकारी के लिए अपने निकटतम स्वयंसेवकों या स्थानीय शाखा से संपर्क करना उचित रहेगा।
॥ संघे शक्ति कलौ युगे ॥

निष्कर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा केवल एक दैनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण, राष्ट्र निर्माण, अनुशासन, सेवा, संगठन तथा भारतीय संस्कृति का एक सशक्त माध्यम है। शाखा में सीखे गए संस्कार जीवनभर व्यक्ति के विचार, व्यवहार एवं कर्तव्यबोध का मार्गदर्शन करते हैं।

"शाखा से समाज • समाज से राष्ट्र"

जब एक स्वयंसेवक प्रतिदिन शाखा में आकर अनुशासन, सेवा, आत्मीयता, नेतृत्व, समरसता एवं राष्ट्रभक्ति का अभ्यास करता है, तब वही संस्कार उसके परिवार, समाज और सम्पूर्ण राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शाखा का वास्तविक उद्देश्य केवल कार्यक्रम सम्पन्न करना नहीं, बल्कि श्रेष्ठ नागरिक एवं सशक्त समाज का निर्माण करना है।

🏛️

चरित्र निर्माण

उत्तम आचरण, आत्मविश्वास एवं उत्तरदायित्व का विकास।

🤝

संगठन

समरस, संगठित एवं जागरूक समाज के निर्माण की प्रेरणा।

❤️

सेवा

निस्वार्थ सेवा एवं समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव।

🇮🇳

राष्ट्र प्रथम

राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर जीवन जीने की प्रेरणा।

🚩 "प्रतिदिन शाखा — प्रतिदिन संस्कार — प्रतिदिन राष्ट्र निर्माण"

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✍️ लेखक परिचय

स्वयंसेवक | संघ आयु : 23 वर्ष

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