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माहाभारत

विदुर कौन है इनके चर्चे विश्व मे क्यो हो रहे है ?आओ जाने

Posted on March 28, 2023December 12, 2023 by student

विदुर पाण्डु तथा धृतराष्ट्र के सौतेले भाई थे (सौतेली माता के पुत्र)। वह धृतराष्ट्र के प्रधानमंत्री थे खरी-खरी बात कहने तथा दूर दृष्टि एवं न्याय प्रियता के गुणों के कारण वह विख्यात थे तथा सदा धर्म का पक्ष लेते (साथ देते) थे। वह दुर्योधन, कर्ण व शकुनि के षड्यंत्रों का सदा ही दृढ़ता पूर्वक विरोध करते थे। वे महान विद्वान एवं नीतिज्ञ थे। वे सदा सद् परामर्श (ठीक सलाह) ही देते थे। वे एक महान दार्शनिक के रूप में विख्यात थे। संकट एवं दुविधा की परिस्थिति में भीष्म भी उन्हीं से परामर्श करते थे (सलाह लेते थे।

राजा भी चिंता एवं निद्राहीन रातें बिताने पर विदुर को ही समस्याएँ सुलझाने के लिए बुलवाते थे। उनकी प्रत्येक भविष्य वाणी सत्य सिद्ध होती थी। परंतु राजा या उनके पुत्रों में से कोई भी उनकी नेक सलाह नहीं मानते थे। सदा विनाश की भविष्यवाणी करने के कारण दुर्योधन उनसे घृणा करता था। विदुर ने भी युद्ध रोकने के भरसक प्रयत्न किए। विदुर की दूरदृष्टि, सतर्कता एवं सावधानी के कारण ही पाण्डव लाक्षागृह के षड्यंत्र से सकुशल निकल आये।

धृतराष्ट्र के पुत्रों, मित्रों और संबंधियों ने षड्यंत्र करके पाण्डवों को जीवित जलाने के लिए लाक्षागृह (लाख जैसी अन्य आग पकड़ने वाले रसायनों से बना हुआ भवन) बनवाया और उन्हें उस भवन में रहने के लिए प्रार्थना की। विदुर ने अपनी कुशलता से इस षड्यंत्र को पहचान कर उसे असफल भी कर दिया। लाक्षागृह में प्रवेश से पूर्व ही युधिष्ठिर को चेतावनी दे दी थी और सदा सतर्क और सावधान रहने को कहा “जो लोग दुष्ट शत्रु की चालों को समझने की समझ रखते हैं,

केवल वे ही संकटों से बचते हैं। शस्त्र जस्ते से भी कठोर धातु से बनाये जाते हैं। एक समझदार व्यक्ति संकटों से बच सकता है, यदि उसे बचने के साधन पता हों। जंगल की आग बिल में रहने वाले चूहे का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। बुद्धिमान व्यक्ति सितारों को देखकर ही अपना परिणाम (भविष्य) समझ लेता है।” इस प्रकार सांकेतिक भाषा में विदुर ने अपेक्षित संकट तथा उससे बचने के उपाय बता दिये।

लाक्षागृह में आग लगने से पर्याप्त समय पूर्व ही विदुर ने वहाँ एक सुरंग बनाने वाले कुशल कारीगर को भिजवाकर युधिष्ठिर से भेंट करके भावी संकट तथा बचाव के लिए सुरंग की सारी योजना समझा दी। यदि विदुर युधिष्ठिर को संकट की पूर्व सूचना एवं बचाव के लिए सहायता न करते, तो पाण्डवों का बचना असंभव होता। मांडव्य ऋषि यौगिक शक्ति एवं ध्यान-शक्ति के धनी थे। वे वन में रहकर योग-साधना में लीन रहते। एक बार कुछ डाकू लूट का माल छिपाने के लिए, उनकी कुटिया के पास पहुँचे।

ऋषि को ध्यानमग्न देखकर वे सारा खजाना कुटिया में छिपाकर चले गए। सिपाही डाकुओं के पदचिन्हों का पीछा करते हुए, वहाँ पहुँचे। साधना मग्न ऋषि से उनके प्रश्नों के उत्तर न पाकर वे कुटिया में चले गए। लूट का खजाना पाकर उन्होंने ऋषि को ही डाकू समझ लिया। उन्होंने राजा के पास पहुँचकर सब कुछ बताया।

विदुर जी के सामने समस्या

राजा ने भी ऋषि मांडव्य को ही दोषी मानकर उन्हें लोहे के पिंजरे में कैद करने का आदेश दिया। ध्यानमग्न ऋषि को सिपाही पिंजरे में कैद करके आ गए। कई महीनों तक ऋषि ध्यानमग्न रहकर जीवित रहे। निकट के सभी ऋषिगण उनके चारों ओर एकत्रित होने लगे। समाचार भयभीत राजा के पास पहुँचा। राजा शीघ्र ही उनके पास पहुँचे तथा उनसे क्षमा-याचना की। ऋषि ने यह कहकर कि “यही मेरी नियति होगी, आप, परेशान न हों” राजा को शांत किया।

ऋषि यमराज के यहाँ पहुँचे तथा उनसे पूछा, “यम देव! मुझे इतना बड़ा दंड किस अपराध के कारण दिया गया है?” यमराज ने उत्तर दिया “आपने एक मधुमक्खी को अकारण ही कष्ट दिया था। मांडव्य ऋषि ने पूछा कि यह कब की घटना है। उत्तर मिला, “जब आप चार वर्ष की आयु के थे।” ऋषि इस विचित्र उत्तर को सुनकर चकित हो गए। उन्होंने कहा, “हे न्यायाधीश यमराज! यह दंड तो न्याय संगत नहीं है, क्योंकि बारह वर्ष की आयु से पूर्व किया गया कोई पाप कर्म पाप की श्रेणी में नहीं आता।

इस तथ्य की उपेक्षा करके आपने मुझे कठोर दंड दिया। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम मृत्युलोक (पृथ्वी पर) में जाकर मानव के रूप में जन्म लो।” ऐसा कहा जाता है कि ऋषि के श्राप के फलस्वरूप यमराज ने विदुर के रूप में जन्म लिया।

भीम कि अधिक जानकारी के लिए आप संघ के अधिकारिक वेबसाइट पर क्लिक http://rss.org और आप हमारे पोर्टल से भी जानकारी प्राप्त कर सकते है उसके लिए यहाँ क्लीक करे https://rsssangh.in

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