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महर्षि नागार्जुन कौन है इनके चर्चे विश्व मे क्यो हो रहे है ?आओ जाने

महर्षि नागार्जुन

महर्षि नागार्जुन जी का सम्पूर्ण जीवन परिचय जाने #महर्षि नागार्जुन

महर्षि नागार्जुन

भारतवर्ष ने विश्व को न केवल चिकित्सा, गणित और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में अपने ज्ञान से समृद्ध किया अपितु रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान जैसे विषयों में भी अभूतपूर्व योगदान दिया है। भारत का रसायन विज्ञान और धातु विज्ञान का इतिहास लगभग 3 हजार वर्ष पुराना है। इस विधा में भारत कितना आगे था इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है

कि 1600 साल पहले बने दिल्ली के महरौली में स्थित लौह स्तम्भ में आज तक जंग नहीं लगी। महर्षि नागार्जुन प्राचीन भारत के सुप्रसिद्ध रसायन शास्त्री, धातु विज्ञानी और चिकित्सक थे। नागार्जुन के जन्म के समय व स्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वानों के अनुसार उनका जन्म गुजरात में स्थित सोमनाथ के निकट दैहिक नामक किले में हुआ था।

वहीं कुछ विद्वानों के अनुसार नागार्जुन का जन्म छत्तीसगढ़ में स्थित सतपुड़ा की सुरम्य पवर्तमालाओं की गोद में स्थित बालूका नामक गांव में हुआ था। नागार्जुन ने बाल्यकाल में ही वेद-वेदांगों का पूर्ण अध्ययन कर लिया था। उन्होंने 12 वर्ष की आयु में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में शोध करना शुरु कर दिया था। #महर्षि नागार्जुन

लगभग 50 ई.पू. से 120 ईस्वी के लगभग शक्तिशाली महाकौशल राज्य की राजधानी श्रीपुर नामक नगर था। श्रीपुर में एक विश्वविद्यालय भी था, जहाँ पूरे विश्व से छात्र अध्ययन करने आते थे। बड़े होकर नागार्जुन ने भी इसी विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। अध्ययन पूर्ण करने के बाद वे इसी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुए।

उन्होंने रसायन विज्ञान, धातु और दवाईयाँ बनाने के क्षेत्र में बहुत शोध किया और अनेक ग्रंथ लिखे। विज्ञान रसायन विज्ञान पर इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें ‘रस रत्नाकर’ और ‘रसेन्द्र मंगल हैं। रस रत्नाकर में उन्होंने पेड़-पौधों अम्ल और क्षार प्राप्त करने की कई विधियाँ बताई हैं। जिनका उपयोग आज भी किया जाता है। हीरे, धातु और मोती घोलने के लिये उन्होंने वनस्पति से बने अम्लों का सुझाव दिया। उसमें खट्टा दलिया, पौधो तथा फलों के रस थे।

इसी पुस्तक में उन्होंने यह भी बताया कि पारे को कैसे शुद्ध किया जाये और उसके यौगिक (कम्पाउंड) कैसे बनायें जाये। रस रत्नाकर में ही महर्षि नागार्जुन ने चाँदी, सोना, टिन और तांबे की कच्ची धातु निकालने और उन्हें शुद्ध करने के तरीके भी बताये हैं। आसवन (डिस्टीलेशन) द्रवण (लिक्वीफिकेशन), उर्ध्वपातन (सबलीमेशन) जैसी रासयानिक विधियों का भी इस पुस्तक में वर्णन किया गया है। पुस्तक में विस्तार पूर्वक बताया गया है। कि अन्य धातुऐ सोने में कैसे बदल सकती हैं। यदि वो सोने में न भी बदलें तो उनके ऊपर आई पीली चमक सोने जैसी ही होगी। इस पुस्तक को उन्होंने अपने और देवताओं के बीच बातचीत की शैली में लिखा था। #महर्षि नागार्जुन

नागार्जुन एक बहुत अच्छे चिकित्सक भी थे, उन्होंने कई बड़े रोगों की औषधियाँ तैयार की। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में रचित उनके प्रमुख ग्रंथ- ‘आरोग्य मंजरी’, ‘कक्षपुटतंत्र’, ‘योगसार’ व ‘योगाष्टक’ हैं। नागार्जुन ने पारे को शोध कर उसकी भस्म बनाने की विधि ज्ञात की तथा बताया कि इससे गम्भीर रोगों को दूर (करने के लिये दवाईयों कैसे बनाई जायें। नागार्जुन ने पारे को शिव तत्व और गंधक को पार्वती तत्व माना और कहा कि इन दोनों तत्वों के हिंगुल (एक प्रकार का खनिज) से जुड़ने पर जो द्रव्य उत्पन्न होता है वो जीवन काल बढ़ाने के लिये काफी फायदेमंद है, इसे उन्होंने ‘रस सिंदूर’ नाम दिया।

नागार्जुन एक महान दार्शनिक भी थे। उन्होंने वैदिक दर्शन एवं बौद्ध दर्शन में समन्वय स्थापित कर भारत की राष्ट्रीय एकात्मकता में महान योगदान दिया था। उनकी विद्वता के कारण उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया। आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी पर बने विशाल बांध का नामकरण उनके सम्मान में नागार्जन सागर किया गया है।

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