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स्वामी विवेकानन्द जी का संझिप्त परिचय
अध्यात्म भावना हिन्दू संस्कृति का एक विशेष गुण है। हजारों वर्ष पश्चात् श्री हम एक मूल सांस्कृतिक बंधन में बंधे हैं। शक, हूण, यवन, तुर्क, अफगान व मुगल आक्रमणकारी भी हिन्दू धर्म और संस्कृति के मजबूत किले को न हिला सके। स्वामी विवेकानन्दपरन्तु अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव व ईसाई मिशनरियों के दुष्प्रचार और धर्मान्तरण के द्वारा लगभग एक सदी में हिन्दू धर्म, सभ्यता व संस्कृति को जबर्दस्त आघात पहुँचा।
भारतीयों के लिये यह अनिश्चय व घोर निराशा की स्थिति थी। तभी 12 जनवरी 1863 ई. को सूर्योदय से 6 मिनट पहले 6.33 पर मकर संक्रांति के दिन कलकत्ता के एक सम्पन्न कायस्थ घराने में इस विश्वविजयी पुत्र का जन्म हुआ। स्वामी जी का वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। स्वामी विवेकानन्दआपके पिता श्री विश्वनाथ दत्त बंगाल के सुप्रसिद्ध वकील थे तथा माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवी धर्मपरायण महिला थी।
स्वामी विवेकानन्द स्वामी जी बाल्यकाल से ही बड़े मेधावी, बुद्धिमान और निर्भीक थे। वे एक बार जो भी पढ़ते या सुन लेते वह सदा के लिये 1 उनके स्मृतिपटल पर अंकित हो जाता।

छात्र जीवन में नरेन्द्रनाथ को व्याख्यान देने में बहुत रुचि थी। ब्रह्मसमाज से प्रभावित होकर नरेन्द्रनाथ उसकी बैठकों में सुरीली आवाज में भजन गाकर लोगों को मुग्ध कर देते थे। सुगठित शरीर के नरेन्द्रनाथ बड़े सुन्दर और आकर्षक थे। स्वामी विवेकानन्दवे कुश्ती, बॉक्सिंग, दौड़, घुड़दौड़ व तैराकी में भी पारंगत थे। नरेन्द्रनाथ एक विचारशील, अध्ययनप्रिय और तार्किक बुद्धि के नवयुवक थे। उनके मन में अनेक प्रश्न उठा करते कि सृष्टि क्या है? जीवन क्या है?
परमात्मा क्या है? इत्यादि-इत्यादि। ब्रह्मसमाज से इनका उत्तर प्राप्त न होने पर जब वे भटक रहे थे तो कलकत्ता के समीप गंगा के तट पर, दक्षिणेश्वर के मंदिर में एक महात्मा रामकृष्ण परमहंस से उनका साक्षात्कार हुआ। स्वामी विवेकानन्दप्रारम्भ में नरेन्द्रनाथ मूर्ति पूजा के विरोधी थे लेकिन यह भी एक संयोग ही था कि उन्हें अपने प्रश्नों का जवाब भी एक महान् मूर्तिपूजक रामकृष्ण परमहंस से ही मिला।स्वामी विवेकानन्द उनसे प्रभावित होकर। नरेन्द्रनाथ उनके शिष्य बन गये,
और परमहंस ने उन्हें विवेकानन्द बना दिया। स्वामी जी ने रामकृष्ण को हिन्दू धर्म की गंगा कहा है जो वैयक्तिक समाधि के कमंडल में बंद थी।स्वामी विवेकानन्द विवेकानन्द के भगीरथ प्रयास ने इस बंद गंगा को विश्व में प्रवाहित किया। परमहंस के निधन के बाद विवेकानन्द परिव्राजक के रूप में देशभ्रमण पर निकल गये।
सितम्बर 1893 ई. में शिकागो (अमेरिका) में एक सर्वधर्म सम्मेलन का आयोजन किया गया। शिष्यों के आग्रह पर स्वामी जी इस सम्मेलन में भाग लेने अमेरिका गये। इस सम्मेलन में विभिन्न देशो से विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के प्रतिनिधि आये थे। भगवे वस्त्र पहने जब भारत का यह युवा संन्यासी बोलने के लिये खड़ा हुआ और मेरे अमेरिकी ‘बहनों और भाइयों’ शब्द से सबका अभिवादन किया
तो वहाँ उपस्थित सभी धर्माचार्य व अन्य लोग उठ खड़े हुये और काफी देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से उनका अभिनन्दन किया गया। हिन्दू धर्म को कूप मंडूक समझने वाले विदेशी स्वामी जी की हिन्दू धर्म सम्बन्धी व्याख्या सुनकर दंग रह गये। विदेशी समाचार-पत्र भी मुक्त कंठ से स्वामी जी के व्याख्यानों की प्रशंसा करने लगे।
स्वामी जी के कई शिष्य बन गये, जिनमें कुमारी नोबल भी थी, जो हिन्दू धर्म ग्रहण करके भगिनी निवेदिता के नाम से प्रसिद्ध हुई। उनके एक शिष्य कप्तान स्वामी जी तीन वर्षों तक अमेरिका और इंग्लैण्ड में रहे, इस दौरान उन्होंने भाषणों, वार्तालापों, लेखों, वाद-विवाद आदि से हिन्दू धर्म और इसकी गूढ़ अध्यात्म भावना को सारे यूरोप में फैलाया।
स्वामी जी के लिखे ग्रंथ “उत्तिष्ठत जाग्रत”, “मेरे गुरुदेव” व “परिव्राजक” हैं। उन्होंने ग्रंथ तो कम लिखे परन्तु उनके भाषण संकलित रूप में उपलब्ध हैं। स्वामी जी धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र, साहित्य, इतिहास, पुराण, उपनिषद सभी के पूर्ण पण्डित थे। अंग्रेजी, संस्कृत, हिब्रू, ग्रीक, फ्रेंच अदि विभिन्न भाषाओं पर भी स्वामी जी का पूर्ण अधिकार था।
अत्यधिक श्रम के कारण स्वामी जी का स्वास्थ्य निरन्तर गिरने लगा। परन्तु स्वामी जी ने इस सबकी परवाह नहीं की व अपने उद्देश्यों की पूर्ति में लगे रहे। स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ने पर कलकत्ता के निकट बैलूर आश्रम में रहते हुये यह विश्वविजेता इतना महान् कार्य करने के बाद केवल 39 वर्ष की अल्पआयु में 4 जुलाई 1902 को रात 9 बजकर 10 मिनट पर महासमाधि के द्वारा आत्मस्वरूप में लीन हो गया।
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