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गुरु गोविन्द सिंह कौन है इनके चर्चे विश्व मे क्यो हो रहे है ?आओ जाने

गुरु गोविन्द सिंह

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गुरु गोविन्द सिंह जी का संझिप्त परिचय

जब-जब भारत में धर्म की हानि हुई, पाप और अत्याचार बढ़ा तब-तब पुनः धर्म की स्थापना के लिये ईश्वरीय शक्ति का उदय हुआ। यह शक्ति प्राचीन काल में राम, कृष्ण, बुद्ध आदि महापुरुषों में जगी थी। मध्य काल में इसी शक्ति का तेज पाकर सिख गुरुओं ने धर्म की रक्षा की। दस सिख गुरुओं की इस ज्योतिमाला में अंतिम गुरु थे गुरु गोविन्द सिंह, जिन्होंने न केवल प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया बल्कि अन्याय और अत्याचारों से पीड़ित हिन्दू जाति की रक्षा का भी संकल्प लिया।

गुरु गोविन्द सिंह

औरंगजेब का शासनकाल भारत के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है, जबकि मुगल साम्राज्य को नष्ट करने के लिये स्थान-स्थान पर भारत की सोई हुई आत्मा जाग उठी थी। दक्षिण में वीर शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति संगठित हो रही थी और बुंदेल खण्ड में महाराज छत्रसाल मुगलों को ललकार रहे थे। राजस्थान में राजा राज सिंह औरंगजेब को चुनौती दे रहे थे एवं इधर पंजाब में गुरु गोविन्द सिंह हिन्दू समाज में साहस का संचार कर रहे थे। उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की-

“राजन के संग रंक लडाऊँ, चिड़ियों से मैं बाज मराऊँ। सवा लाख संग एक लडाऊँ तभी तो गोविन्द नाम कहाऊँ।।गुरु गोविन्द का जन्म पौष शुक्ल सप्तमी सम्वत् 1723 को पटना, बिहार में हुआ था। इनका मूल नाम गोविन्द राय था। इनके पिता गुरु तेगबहादुर का औरंगजेब ने इस्लाम धर्म स्वी कार न करने पर चाँदनी चौक, दिल्ली में शीश कटवा दिया था। इसी स्थान पर इस समय गुरुद्वारा शीशगंज स्थित है।

गुरु तेगबहादुर की शहादत के बाद मात्र 9 वर्ष की आयु में गोविन्द राय को गुरु गद्दी पर बैठाया गया। गुरु की गरिमा बनाये रखने के लिये गोविन्द राय ने अपना ज्ञान बढ़ाया और संस्कृत, फारसी, पंजाबी व अरबी भाषा सीखी। साथ ही उन्होंने धनुष बाण, तलवार, भाला आदि चलाने की कलाएं भी सीखीं। उन्होंने अपने अनुयायियों को धर्म, जन्मभूमि और स्वयं की रक्षा करने का संकल्प दिलाया और उन्हें मानवता का पाठ भी पढ़ाया।

गुरु गोविन्द सिंह जहाँ विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान योद्धा, विद्वान लेखक, मौलिक चिन्तक, आध्यात्मिक नेता तथा कई भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने स्वयं अनेक ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उन्होंने अपने दरबार में 52 कवियों और लेखकों को नियुक्त कर रखा था, इसलिये उन्हें ‘संत सिपाही’ भी कहा जाता है। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे। गुरु गोविन्द सिंह ने पवित्र गुरु ग्रंथ साहब को पूरा किया।

“विचित्र नाटक’ को उनकी आत्मकथा माना जाता है, यह उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दशम ग्रंथ का एक भाग है, दशम ग्रंथ गुरु गोविन्द की कृतियों के संकलन का नाम है। इसके अतिरिक्त उन्होंने जफरनामा व हिन्दी में कई ग्रंथों की रचना की, जिनमें कुछ के नाम हैं- सुनीति प्रकाश, सर्वलोह प्रकाश, प्रेम सुमार्ग, बुद्धि सागर और चंडी चरित्र। चंडी चरित्र में दुर्गा सप्तसती की कथा बड़े ओजस्वी रूप में कही गई है।

गुरु गोविन्द सिंह ने 1699 ई. में वैशाखी के दिन धर्म और समाज की रक्षा हेतु खालसा पंथ की स्थापना की। खालसा का अर्थ है- खालिस अर्थात् विशुद्ध, निर्मल और बिना किसी मिलावट वाला व्यक्ति। खालसा हमारी मर्यादा और भारतीय संस्कृति की एक पहचान है जो हर हाल में प्रभु का स्मरण रखता है और अपने कर्म को अपना धर्म मानकर जुल्म और जालिम से लोहा भी लेता है। गुरु गोविन्द का विचार था कि जब सारे साधन निष्फल हो जाएं तो तलवार ग्रहण करना न्यायोचित है।

पाँच प्यारे जो देश के विभिन्न भागों से आये थे और समाज की अलग-अलग जाति और सम्प्रदाय के लोग थे, उन्हें एक ही कटोरे में अमृत पिलाकर गुरु गोविन्द सिंह ने ऊँच-नीच के भाव को भी समाप्त कर दिया। उनका स्पष्ट मत था – “मानस की जात सभ एक हैं।” उन्होंने सिखों को विशेष प्रकार का वेश पहनने और विशेष चिह्न धारण करने की भी आज्ञा दी। गुरु जी ने आदेश दिया कि भविष्य में सब अपने नाम के पीछे ‘सिंह’ लगाया करें।

सब अपने को सिंह सपूत समझे और केश, कड़ा, कंघी, कच्छा और कृपाण ये पाँच ‘ककार’ धारण करें। गुरु जी ने स्वयं अपना नाम गोविन्द राय से बदलकर गोविन्द सिंह कर लिया। इस प्रकार खालसा शक्ति का संगठन कर गुरु जी ने हिन्दू जाति की रक्षा का व्रत लिया।

सकल जगत में खालसा पन्थ गाजे। जगे धर्म हिन्दू तुरक धुंद भाजे।।

गुरु गोविन्द सिंह के मुगलों व उनके सहयोगियों के साथ 14 युद्ध हुए। चमकौर के इतिहास प्रसिद्ध युद्ध में औरंगजेब की विशाल सेना से लड़ते हुए गुरु गोविन्द सिंह के बड़े पुत्र अजीत सिंह (आयु 18 वर्ष) व दूसरे पुत्र जुझार सिंह (आयु 14 वर्ष) वीरगति को प्राप्त हुए। उनके दोनों छोटे पुत्र जोरावर सिंह व फतेह सिंह युद्ध की भगदड़ में शत्रु के हाथ लग गये जिन्हें सरहिंद के नवाब वजीर खाँ ने इस्लाम स्वीकार न करने के कारण जिंदा ही दीवार में चिनवा दिया। गुरु जी नान्देड़ (महाराष्ट्र) चले गये, शत्रु ने समझा कि वे मारे गये। बाद में वीर बंदा बैरागी ने वजीर खाँ को मारकर गुरु पुत्रों की हत्या का बदला ले लिया।

  • मुगलों के द्वारा भेजे गये एक मुसलमान ने सोते समय गुरुजी के पेट में छुरा घोंप दिया। गुरु जी ने फुर्ती से उठकर इस हालत में भी तलवार का ऐसा प्रहार किया कि वह दुष्ट वहीं ढेर हो गया। गुरु जी का घाव तो भर गया परन्तु कमजोरी फिर भी बनी रही। एक दिन उन्होंने एक बड़ी भारी कमान को इतने जोर से खींचा कि घाव फिर से खुल गया। बहुत इलाज किया परन्तु घाव ठीक न हो सका। अंततः 1708 ई. को केवल 42 वर्ष की अल्पायु में उनका नान्देड़ में देहान्त हो गया। इसके पूर्व अपना अंतिम समय निकट जानकर उन्होंने अपने सभी अनुयायियों को एकत्र किया और उन्हें मर्यादित तथा शुभ आचरण करने, देश से प्रेम करने तथा सदा दीन-दुखियों की सहायता करने की सीख दी। इसके बाद यह भी कहा कि उनके बाद कोई दूसरा देहधारी गुरु नहीं होगा तथा ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ ही आगे गुरु के रूप में उनका मार्गदर्शन करेंगे।

गुरु गोविन्द सिंह हिन्दू मूल्यों और आर्य संस्कृति की रक्षा के लिये जीवन भर संघर्ष करते रहे। उन्होंने मात्र 9 वर्ष की आयु में अपने पिता को बलिदान की प्रेरणा दी, तो अपने चारों पुत्रों को भी देश धर्म की रक्षा में वार दिया, इसीलिये उन्हें सरवन्श दानी कहा गया। यद्यपि सिख सम्प्रदाय की निर्गुण उपासना है, पर सगुण स्वरूप के प्रति इन्होंने पूरी आस्था प्रकट की है ।

देह सिवा बरु मोहे ईहै । सुभ करमन ते कबहुं न टरों ॥ न डरों अरि सो जब जाइ लरों। निसचै करि अपुनी जीत करों ॥ अरु सिख हों आपने ही मने कौ । इह लालच हउ गुन तउ उचरों ॥ जब आव की अउध निदान बनै। अति ही रन मै तब जूझ मरों ॥

उनके इस आह्वान ने मृतप्रायः हिन्दू जाति में प्राणों का संचार किया। हिन्दू जाति पर गुरुजी ने जो उपकार किये वे चिर स्मरणीय रहेंगे।

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