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लोकमान्य तिलक कौन है इनके चर्चे विश्व मे क्यो हो रहे है ?आओ जाने

लोकमान्य तिलक

लोकमान्य तिलक जी का सम्पूर्ण जीवन परिचय जानने की इच्छा से आपने हमारे पेज का चयन किया उसके लिए आपका धन्यवाद और आपका स्वागत हैलोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

लोकमान्य तिलक जी का सझिप्त परिचय

23 जुलाई 1856 ई. को महाराष्ट्र में जन्मे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी के असाधारण त्याग, तपस्या, सच्ची देशभक्ति और सबल राष्ट्रीय प्रवृत्ति ने पराधीन देशवासियों के तन-मन में अभूतपूर्व उत्साह का संचार कर दिया था।लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उन्होंने पहली बार स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है औरलोकमान्य बाल गंगाधर तिलक मैं इसे पाकर रहूंगा।’

तिलक जी ने मराठी भाषा में ‘केसरी’ तथा अंग्रेजी भाषा में ‘मराठा’ समाचार पत्र प्रकाशित किये, जिनके माध्यम से उन्होंने जीवन पर्यन्त प्राकृतिक अधिकार, राजनीतिक स्वतंत्रता व न्याय के सिद्धान्तों को जन-जन तक पहुँचाया। सन् 1893 ई. में उन्होंने ‘केसरी’ में लिखा ‘भारत में अंग्रेज नौकरशाही से प्रार्थना करके हम कुछ प्राप्त नहीं कर सकते हैं। ऐसा करना तो दीवार से सिर टकराने के समान है।’

तब तक कांग्रेस ज्ञापनों के द्वारा सरकार से कुछ छूटे और सहूलियत हासिल करना ही अपना काम समझती थी। कांग्रेस को अंग्रेज सरकार के प्रशंसक के स्थान पर विरोधी बनाने में तिलक जी की भूमिका महत्वपूर्ण रही। वे भारत की स्वतन्त्रता के लिए हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहते थे,लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक परन्तु लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वह हिंसा अपनाने को बुरा भी नहीं मानते थे। उन्होंने देशवासियों से कहा- ‘अगर हमारे घर में चोर घुस आयें

और हममें उन्हें भगाने की ताकत न हो तो हमें निःसंकोच उन्हें बंद कर देना चाहिये और जिन्दा जला देना चाहिये।’लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

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तिलक जी की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित अंग्रेज सरकार ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर 6 वर्ष की सजा देकर बर्मा की मांडले जेल भेज दिया। मांडले जेल में दुखों की अनुभूति को पूर्ण तिलांजलि देकर उन्होंने गीता पर एक अद्वितीय भाष्य लिख डाला जिसका नाम ‘गीता रहस्य’ रखा। इसके लिए प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि ‘गीता एक बार तो भगवान श्रीकृष्ण के मुख से कही गयी, किन्तु इस बार उसका सच्चा व्याख्यान लोकमान्य जी ने किया है।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक’ नेता जी सुभाष जब 1925 में मांडले जेल में रहे तो उस समय भी इस जेल की दशा बहुत खराब थी, उन्होंने कहा कि ‘तिलक जी ने ऐसी परिस्थिति में गीता रहस्य जैसी पुस्तक कैसे लिख दी? ऐसी पुस्तक तो केवल वही लिख सकता है जो योगी की तरह दुख-सुख की अनुभूति बिल्कुल छोड़ दे।’ मांडले जेल में रहते हुए ही तिलक जी ने एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक ‘आर्कटिक होम इन वेदाज’ भी लिखी।

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तिलक जी पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति की तुलना में भारतीय संस्कृति को श्रेष्ठ मानते थे। उन्होंने युवकों में देशभक्ति और वीरता का भाव भरने के लिए अनेक तरीके अपनाये। गोवध विरोधी समितियाँ, लाठी-क्लब और अखाड़ों की स्थापना की। तिलक जी का हिन्दू संस्कृति, आचार-विचार एवं हिन्दू संस्कारों में पूर्ण विश्वास था। वे भारत को एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। युवकों में अपने धर्म के प्रति लगाव पैदा करने के उद्देश्य से गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव मनाना प्रारम्भ किया ।

निःसंदेह तिलक जी ने अपने विचारों तथा कार्यों के लिए उस समय के राजनीतिज्ञों में सबसे अधिक कष्ट सहन किये। उन्हीं की प्रेरणा से भारतीय जनमानस में आत्मविश्वास और निडरता का भाव पैदा हुआ और वह अपनी आज़ादी के लिए बलिदान देने के लिए तत्पर हुआ। निरन्तर संघर्षों और असीम कष्टों को सहते-सहते तिलक जी का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया था। परिणामस्वरूप यह महान् कर्मयोगी 1 अगस्त 1920 को चिरनिद्रा में लीन हो गया।

तिलक जी का सारा जीवन स्वतंत्रता प्राप्ति व भारतीय संस्कृति के उत्थान के लिए महान् संघर्षों की एक अमर गाथा है। उनके कट्टर विरोधी शिरोल ने भी उनकी प्रशंसा करते हुए कहा- ‘वर्तमान युग में तिलक जैसा अन्य कोई लोकोत्तर पुरुष नहीं हुआ। कदाचित् गाँधी उनके समकक्ष रह सकते हैं।”

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