गीत
थाल सजाकर किसे पूजने, चले प्रात ही मत वाले, कहा चले तुम राम नाम का, पीताम्बर तन पर डाले।
इधर प्रयाग न गंगा सागर, इधर न रामेश्वर काशी, इधर कहा है तीर्थ तुम्हारा, कहा चले तुम सन्यासी । चले झूमते मस्ती से क्या, तुम अपना पथ आये भूल, कहा तुम्हारा दीप जलेगा, कहा चढ़ेगा माला फूल।
मुझे न जाना गंगासागर, मुझे न रामेश्वर काशी, तीर्थ राज चित्तौड़ देखने, को मेरी आँखे प्यासी । अपने अटल स्वतन्त्र दुर्ग पर, सुनकर वैरी की बोली, निकल पड़ी लेकर तलवारें, जहाँ जवानों की टोली।
जहाँ आन पर माँ बहनों की, जला जला पावन होली, वीर मण्डली गर्वित स्वर में, जय माँ की जय-जय बोली।
सुन्दरियों ने जहाँ देश हित, जौहर व्रत करना सीखा, स्वतन्त्रता के लिये जहाँ पर, बच्चों ने भी मरना सीखा।
वही जा रहा पूजा करने, लेने सतियों की पद धूल, वही हमारा दीप जलेगा, वही चढ़ेगा माला फूल। जहाँ पदमिनी जौहर व्रत करती, चढ़ी चिता की ज्वाला पर, क्षण भर वहीं समाधी लगेगी, बैठ इसी मृग छाला पर।
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