गणगीत
हमें वीर केशव मिले आप जब से । नई साधना की डगर मिल गई है।। ध्रु ।। भटकते रहे ध्येय-पथ के बिना हम, न सोचा कभी देश क्या धर्म क्या है? न जाना कभी पा मनुज-तन जगत में, हमारे लिए श्रेष्ठतम कर्म क्या है? दिया ज्ञान जब से मगर आपने है, निरन्तर प्रगति की डगर मिल गई है ।11।।
हमें वीर केशव ….
समाया हुआ घोर तम सर्वदिक् था, सुपथ है किधर कुछ नहीं सूझता था। सभी सुप्त थे घोर तम में अकेला, हृदय आपका हे तपी जूझता था। जलाकर स्वय को किया मार्ग जगमग, हमें प्रेरणा की डगर मिल गई । 1211
हमें वीर केशव
बहुत थे दुःखी हिन्दु निज देश में ही, युगों से सदा घोर अपमान पाया। द्रवित हो गये आप यह दृश्य देखा, नहीं एक पल को कभी चैन पाया। हृदय की व्यथा संघ बन फूट निकली, हमें संगठन की डगर मिल गई है। 1311
हमें वीर केशव ….
करेंगे पुनः हम सुखी मातृ भू को, यही आपने शब्द मुख से कहे थे। पुनः हिन्दु का हो सुयश गान जग में, संजोये यही स्वप्न पथ पर बढ़े थे। जला दीप त्योतित किया मातृ मन्दिर, हमें अर्चना की डगर मिल गई है ।।4।1
हमें वीर केशव ….
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